महाराजा हरि सिंह और नेहरु-अब्दुल्ला की जुगलबन्दी -भाग -3

21 Sep 2017 22:13:11

हरि सिंह, नेहरू और शेख अब्दुल्ला

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

बहुत से  क्षेत्रों के मुसलमान पाकिस्तान बनाने या उसमें जाने के इच्छुक नहीं थे। अंग्रेज़ों के भारत से चले जाने के पूर्व 1946 में ब्रिटिश इंडिया के विभिन्न प्रान्तों में चुनाव हुए थे। ये चुनाव मुख्य तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सीधा मुक़ाबला था। मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनाने के नाम पर चुनाव लड़ रही थी और कांग्रेस भारत को अखंड रखने के नाम पर चुनाव लड़ रही थी। पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त जहाँ 99 प्रतिशत मुसलमान थे, में मुस्लिम लीग पराजित हुई थी। वहां की विधान सभा की पचास सीटों में से तीस कांग्रेस ने जीतीं और मुस्लिम लीग केवल सत्रह सीटें जीत सकी। पंजाब में जहाँ  60प्रतिशत मुसलमान थे, वहाँ भी मुस्लिम लीग 175 में से केवल 73 सीटें जीत सकी। कांग्रेस, यूनियननिस्ट पार्टी और अकाली दल ने 93 सीटें जीतीं। ये तीनों दल पाकिस्तान निर्माण का विरोध कर रहे थे। इसलिए जिस प्रकार पंजाब और सीमान्त प्रान्त में मुसलमानों का बहुमत होते हुए भी, वहाँ के मुसलमान पाकिस्तान निर्माण के लिए बहुत इच्छुक नहीं थे उसी प्रकार कश्मीरी मुसलमान भी पाकिस्तान में जाने के लिये लालायित नहीं थे। लेकिन नेहरु इसे शेख़ के प्रभाव का परिणाम मान बैठे थे। नेहरु की इस मानसिकता की पृष्ठभूमि में आसानी से समझा जा सकता है कि यदि यह प्रचारित हो जाये कि जम्मू कश्मीर को देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा महाराजा हरि सिंह ने बनाया है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात हो सकती थी ? कोई भी हिन्दू राजा भला पाकिस्तान में कैसे शामिल हो सकता था जब पाकिस्तान का निर्माण ही इस आधार पर किया गया हो कि मुसलमान हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते। यदि जम्मू कश्मीर के अधिमिलन का श्रेय महाराजा हरि सिंह को जाता तो नेहरु मानसिक रुप से भारत विभाजन के अपराध बोध से कैसे मुक्त हो सकते थे ? यह तो तब होता यदि कश्मीर का कोई मुस्लिम नेता आगे आकर कहे कि मुसलमान पाकिस्तान में नहीं जाएँगे बल्कि हिन्दुस्थान में रहेंगे। उस समय यह बात शेख़ अब्दुल्ला ही कह रहे थे। शेख़ अब्दुल्ला को आगे करके नेहरु एक प्रकार से जिन्ना को उत्तर दे रहे थे कि तुम्हारा द्विराष्ट्र का सिद्धान्त ग़लत है। मुसलमान भारत में रहना चाहते हैं। इससे से वे जिन्ना को उत्तर भी दे रहे थे और साथ ही व्यक्तिगत रूप से भारत विभाजन में अपनी भूमिका के अपराध बोध से मुक्त भी हो रहे थे।
                           

सोने पर सोहागा यह कि शेख़ अब्दुल्ला यह भी बता रहा था कि भारत के पक्ष में उसका निर्णय पंडित नेहरु के नेतृत्व और उनकी विचारधारा के कारण है। नेहरु को कांग्रेस के भीतरी खींचतान में शेख़ अब्दुल्ला के इस समर्थन की उस समय बहुत जरुरत थी क्योंकि सरदार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस के भीतर की राष्ट्रवादी शक्तियाँ महसूस कर रहीं थीं कि नेहरु की नीतियाँ कालान्तर में भारत को एक और संकट में डाल देंगी। इस लिए नेहरु ने भी देश भर में कहना शुरु कर दिया कि शेख़ के नेतृत्व में कश्मीर के लोग भारत के साथ इसलिए रहना चाहते हैं कि देश का नेतृत्व उनके हाथ में है। लेकिन कल यदि नेतृत्व राष्ट्रवादी शक्तियों के पास आ जाता है तो कश्मीर का क्या होगा ? वे कई साल तक यह राग अलापते रहे। कोलकाता में उन्होंने प्रथम जनवरी 1952 को एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा,"हमारी पंथनिरपेक्षता की इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है कि कश्मीर के लोग भी हमारी ओर खिंचे चले आए। यदि जनसंघ या अन्य कोई साम्प्रदायिक पार्टी सत्ता की सूत्रधार होती तो कश्मीर का क्या हो गया होता, इसकी कल्पना की जा सकती है। कश्मीर के लोग कहते हैं कि वे साम्प्रदायिकता से तंग आ चुके हैं। वे उस देश में क्यों रहेंगे जहाँ जनसंघ या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनको धकियाता है। वे हमारे साथ नहीं रहेंगे बल्कि कहीं और चले जायेंगे। (. Selected works of Jawaharlal nehru, second series, volume 17, p 78)   पंडित जवाहर लाल नेहरु की दृष्टि में भारतीयता की अवधारणा ही साम्प्रदायिक थी और उसके कारण महाराजा हरि सिंह भी घोर साम्प्रदायिक थे। नेहरु इससे एक और स्थापना भी कर रहे हैं कि कश्मीर घाटी के मुसलमान भारत में शामिल नहीं हुए बल्कि नेहरु के भारत में शामिल हुए हैं। उधर शेख़ कह ही चुके थे कि कश्मीरी डरे हुए हैं कि नेहरु के बाद हमारा क्या होगा। प्रकारान्तर से नेहरु अपने आप को भारत मान रहे थे और शेख़ अब्दुल्ला स्वयं को कश्मीर मान बैठे थे। जम्मू कश्मीर की आगे की सारी राजनीति इसी दूषित मनोविज्ञान में से उपजी।  इसलिये नेहरु ने  एक साथ महाराजा हरि सिंह को धकियाना शुरु किया और शेख़ अब्दुल्ला को महिमा मंडित करना शुरु किया। नेहरु हरि सिंह को जम्मू कश्मीर में अप्रासांगिक बता रहे थे और शेख़ अब्दुल्ला अपनी सोची समझी रणनीति के तहत उन्हें जम्मू के मुसलमानों के नरसंहार का दोषी बता रहे थे।
                     

डोगरी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान शिव नाथ ने ठीक ही कहा है, "1947 में मुस्लिम बहुसंख्यक रियासत के हिन्दू शासक महाराजा हरि सिंह को बहुत ही विपरीत स्थिति से सामना करना पड़ रहा था। पाकिस्तान का दबाव व आक्रमण दिन प्रतिदिन तीव्र होता जा रहा था। रियासत के जनान्दोलन का दबाव अपनी जगह था। रियासती सेना के मुसलमान दूसरे पक्ष के साथ मिल गये थे। ह्रदय विदारक हत्याएँ और नरसंहार हो रहा था। इस हालात में महाराजा इस सबसे परेशान थे, कोई भी उनको समझ नहीं रहा था और उनको ग़लत रुप में चित्रित किया जा रहा था।"( शिवनाथ122)

                 

शेख़ अब्दुल्ला नेहरु के मनोविज्ञान और उनके अपराध बोध को जल्दी ही समझ गये और उन्होंने जल्दी ही इसकी क़ीमत बसूलना शुरु कर दिया। जम्मू कश्मीर की वर्तमान समस्याएँ उसी क़ीमत बसूलने की प्रक्रिया में से उपजी हैं। विभाजन के उपरान्त जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र का प्रयोग,  राज्य के तीनों संभागों ( शेष दो संभागों गिलगित और बल्तीस्तान पर पाकिस्तान ने क़ब्ज़ा कर लिया था और नेहरु ने उसे मुक्त करवाना इसलिये जरुरी नहीं समझा क्योंकि वहाँ के लोग शेख़ की पार्टी से ताल्लुक़ नहीं रखते थे और न ही उसे अपना नेता मानते थे ) के लोगों और महाराजा हरि सिंह को साथ लेकर संयुक्त रुप में संवाद के साथ करना चाहिये था। इसमें शेख़ अब्दुल्ला भी एक पात्र होते।  लेकिन नेहरु ने बाक़ी सभी को दरकिनार  कर कश्मीर घाटी के शेख़ अब्दुल्ला के सहारे ही जम्मू कश्मीर में संवाद रचना की। इससे जम्मू संभाग, लद्दाख संभाग और कश्मीर घाटी के भी वे लोग जो शेख़ अब्दुल्ला की नैशनल कान्फ्रेंस का हिस्सा नहीं थे अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगे। इससे भी बढ़ कर नेहरु कश्मीर संभाग में मुसलमानों को बहुसंख्यक देख कर एक बार फिर तुष्टीकरण के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने के रास्ते पर चल निकले थे। ध्यान रहे एक बार पहले भी बाबा साहिब आम्बेडकर ने कांग्रेस को इसी मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते से बचने की सलाह दी थी, क्योंकि इसके परिणाम अशुभ ही निकलते हैं। संवाद हीनता से उपजा यह प्रयोग शेख़ अब्दुल्ला के भीतर केवल तानाशाही प्रवृत्तियाँ ही नहीं बल्कि स्वतंत्र होने तक की इच्छाएँ जगाने लगा था। लेकिन प्रयोग के इस मोड  तक आते आते सरदार पटेल की मृत्यु हो चुकी थी, नहीं तो शायद वे ही इसमें कुछ दख़लन्दाज़ी करते और प्रयोग को सही दिशा में ले जाकर इसे डूबने से बचा लेते। अधिमिलन के उपरान्त, राज्य की राजनीति में यदि महाराजा हरि सिंह को भी नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने लिए नई भूमिका चुन लेने का विकल्प या अवसर दिया होता तो यक़ीनन आज दरपेश आ रही समस्याओं से बचा जा सकता था।

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