जम्मू कश्मीर के भारत में विलय का खामोश नायक - महाराजा हरि सिंह

21 Sep 2017 10:56:24

 


डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

महाराजा हरि सिंह काल के परिवर्तन को अच्छी तरह जानते ही नहीं थे बल्कि उसके साक्षी भी थे। वे इतना तो समझ ही गए थे कि भविष्य के भारत में हिन्दी अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान संभालेगी और राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में भी उसकी प्रमुख भूमिका रहेगी। इसलिए उन्होंने अपनी रियासत में हिन्दी भाषा के विकास के लिए प्रमुख भूमिका निभाई। 1936 में रियासत में हिन्दी प्रचारिणी सभा का गठन किया गया। यह संस्था प्रदेश में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए तो काम कर ही रही थी लेकिन इसके साथ साथ सभा ने पाठशालाओं में शिक्षा का माध्यम हिन्दी करने की भी माँग की। इसके कारण प्रदेश के नौजवानों को रियासत से बाहर भी नौकरी की संभावना बढ़ सकती थी। अभी तक रियासत का शिक्षा विभाग अरबी लिपि में ही पुस्तकों का प्रकाशन करता था। महाराजा हरि सिंह स्वयं हिन्दी की सार्वदेशिक महत्ता को समझते थे इसलिए उन्होंने विभिन्न पुस्तकें उर्दू के साथ साथ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित करवाने की व्यवस्था की। महाराजा हरि सिंह की सरकार ने शासकीय आदेश जारी किया," शिक्षा का माध्यम सहज उर्दू होना चाहिए। लेकिन लिखने और पढ़ने के लिए देवनागरी लिपि फ़ारसी लिपि ,दोनों का प्रयोग किया जाने चाहिए। पुस्तकों काम मसौदा प्रत्येक विषय में सहज सरल होना चाहिए। लेकिन यह मसौदा दोनों लिपियों अर्थात देवनागरी और उर्दू में होना चाहिए। विद्यार्थियों को पूरी स्वतंत्रता थी कि वे देवनागरी या उर्दू लिपि में लिखें या पढ़ें। अध्यापकों के लिए भी हिन्दी अथवा उर्दू दोनों लिपियों को एक साल के भीतर भीतर सीखना होगा और अपने इस ज्ञान को अधिकारियों के आगे प्रकट भी करना होगा। भविष्य में कोई भी अध्यापक शिक्षा विभाग में तभी नौकरी कर सकेगा , यदि उसे देवनागरी और उर्दू ,दोनों लिपियां आती होंगी। (36) हरि सिंह के लिए भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है , उसका किसी मज़हब से कुछ लेना देना नहीं होता। महाराजा हरि सिंह डोगरा राजवंश के पहले शासक थे जिन्होंने कश्मीरी भाषा सीखी ताकि अपनी प्रजा से सीधा संवाद कर सकें और कश्मीरियों के मन की बात समझ सकें। वे कश्मीरियों से उन्हीं की भाषा में बात करने का प्रयास करते थे।

लेकिन दुर्भाग्य से शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के नेतृत्व में नैशनल कान्फ्रेंस के सदस्यों ने हिन्दी भाषा का पुरज़ोर विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह एक प्रकार से इस्लाम पर प्रहार ही था और उनका आरोप था कि यह रियासत के हिन्दूकरण की दिशा में एक क़दम है। मामला यहाँ तक बढ़ा कि नैशनल कान्फ्रेंस के सदस्यों ने इस मुद्दे पर प्रजा सभा से त्यागपत्र तक दे दिया। लेकिन इस प्रश्न को लेकर नैशनल कान्फ्रेंस के भीतर भी विवाद खड़ा हो गया। जम्मू प्रान्त के अनेक सदस्यों ने नैशनल कान्फ्रेंस के इस साम्प्रदायिक रवैए के कारण पार्टी से ही " यह कह कर इस्तीफ़ा दे दिया कि ऐसी पार्टी जो पंथ निरपेक्ष होने का दम भर्ती है लेकिन हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा कह कर नकारती है से हमारा कोई सम्बंध नहीं है।( 37) जम्मू के बंसी लाल सूरी का नाम तो उस समय नैशनल कान्फ्रेंस की ओर से मंत्री पद के लिए भी चल रहा था लेकिन हिन्दी के प्रश्न पर उन्होंने इसकी भी चिन्ता नहीं की और नैशनल कान्फ्रेंस छोड़ दी। इतना ही नहीं जब ब्रिटिश सरकार सफलता पूर्वक कोशिश कर रही थी कि रियासतों में भी प्रशासन का ढाँचा ही नहीं बल्कि उसका नामकरण भी पश्चिमी अवधारणाओं  के आधार पर ही हो तो उसका विरोध महाराजा हरि सिंह अपने ढंग से कर रहे थे। उन्होंने रियासत में पश्चिमी पंचांग को आधार न बना कर भारतीय पंचांग विक्रमी संवत् को लागू किया था। इतना ही नहीं उन्होंने प्रशासनिक पदों का नामकरण भी परम्परागत भारतीय पद्धति से किया था। महाराजा हरि सिंह ने 5 अक्तूबर 1934  को राजकीय आदेश -99 लागू किया जिसके अनुसार," भविष्य में निम्नलिखित पदों को इस प्रकार लिखा जायेगा।
Executive council ------ अमात्य मंडल
Prime Minister---- प्रधान अमात्य
Mnister---- अमात्य
इन शब्दों का प्रयोग उक्त पदों के दावेदारों के आगे अथवा पीछे लगेगा।"(38) इससे सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि महाराजा हरि सिंह भारत के भविष्य में कितनी दूर तक देख सकते थे। भारतीयता उनके चिन्तन और प्रशासन का आधार था।

जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान के संभावित आक्रमण की सूचना महाराजा हरि सिंह को थी। उनको पकड़ने की फ़िराक़ में पाकिस्तान के कुछ एजेंट भी घात लगा कर बैठे हैं , यह सूचना भी उनके पास थी। पुँछ में कुछ स्थानीय समस्याओं को लेकर वहाँ कुछ सरकार विरोधी वातावरण है , यह भी उन्हें पता ही था। लेकिन इन विकट और विपरीत परिस्थितियों में भी वे रियासत के उत्तेजित क्षेत्रों का जायज़ा लेने के लिये अपने प्रधानमंत्री को लेकर निकल पड़े थे। उस समय के डेनमार्क के राजदूत लारस बलिंकनवर्ग के अनुसार," महाराजा ने अपने प्रधानमंत्री मेहरचन्द महाजन के साथ 18 अक्तूबर से लेकर 23 अक्तूबर तक जम्मू के पश्चिमी हिस्सों का दौरा किया था। पाकिस्तान उन दिनों पुँछ और जम्मू में जिस स्थानीय विद्रोह की चर्चा करता है, वह इतना व्यापक नहीं था कि महाराजा के प्रवास कार्यक्रम को रोक पाता।"( Narendra Singh Sarila,The Shadow of the great game: the untold story of India's Partition, p 348) महाराजा हरि सिंह रियासत को पाकिस्तान में शामिल नहीं करना चाहते थे। हिन्दुस्तान के वायसराय इस काम के लिये उन पर दबाव डालने के लिये चार दिन श्रीनगर में डेरा डाल कर बैठे रहे। लेकिन वायसराय की नीयत भाँप कर महाराजा ने उससे मिलने से भी इन्कार कर दिया। अंग्रेज़ वायसराय के सामने यह साहस शायद हरि सिंह ही दिखा सकते थे। पाकिस्तान के गवर्नर जनरल जिन्ना से मिलने से भी उन्होंने इन्कार कर दिया था।

 जम्मू कश्मीर के मामले में सभी प्रमुख पात्रों को अपनी अपनी असफलताओं या षड्यंत्रों को छिपाने के लिये  किसी न किसी बली के बकरे की तलाश थी। महाराजा हरि सिंह से आसान शिकार और भला कौन हो सकता था ?  इस पूरे नाटक के प्रमुख पात्रों ने अपनी अपनी कथा बयां कर दी और इस बयान में अपने को पाक साफ़ बताते हुये जम्मू कश्मीर समस्या का उत्तरदायित्व हरि सिंह के दरवाज़े पर जाकर पटक दिया। शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला सुपुर्द-ए-ख़ाक होने से पहले आतिश-ए-चिनार बयां कर गये और अपनी इस मृत्यु पूर्व घोषणा में हरि सिंह को अपराधी सिद्ध करने का प्रयास करते रहे। शेख़ का बयान इतना भ्रामक है कि उन्हीं के दोस्त कमाल अहमद सिद्दीक़ी को ,'कश्मीर एक मंजरनामा' लिखना पड़ा। लार्ड माऊंटबेटन ने ख़ुद चाहे कुछ नहीं लिखा , लेकिन उनको निर्दोष सिद्ध करने के लिये उनका भारी भरकम स्टाफ़ मौजूद था। माऊंटबेटन और उसकी जीवनी लेखकों ने तो कभी इस बात को छिपाया भी नहीं कि उनकी रुचि रियासत को पाकिस्तान में मिलाने की थी। माऊंटबेटन के आतंकवादी विस्फोट में मारे जाने से वर्षों पूर्व कितनी किताबें उनके  अपराध मुक्त होने की घोषणा कर रहीं थीं। लेकिन ताज्जुब है कि रियासत की वर्तमान हालत के लिये माऊंटबेटन भी दोष महाराजा के मत्थे ही मढ़ रहे थे। नेहरु के जीवनीकारों ने सदा ही रियासत के मामले में की गई उनकी तमाम गल्तियों को महाराजा हरि सिंह के खाते में डालने  के सफल प्रयास किये। नेहरु स्वयं भी सारा दोषारोपण हरि सिंह पर करने में कभी चूकते नहीं थे। यहाँ तक कि हरि सिंह के सुपुत्र कर्ण सिंह ने भी उस संकट काल में अपने पिता का साथ न देकर नेहरु-शेख़ के साथ चले जाने के प्रकरण में अपनी सफ़ाई देने के लिए अपनी आत्मकथा में महाराजा को समय से पिछड़ा सिद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं रखी।
             

महाराजा हरि सिंह अपने स्वभाव में विद्रोही प्रकृति के थे। 1947 में परिस्थितियों के अनुकूल वे भी  अनेक समझौते कर सकते थे ,जिससे उनके व्यक्तिगत हितों की रक्षा हो सकती थी लेकिन राष्ट्रीय हितों को नुक़सान पहुँचता। परन्तु उन्होंने व्यक्तिगत हित की तुलना में राष्ट्रीय हित को ही अधिमान दिया। वे धुन के पक्के थे। पराजय उन्हें स्वीकार नहीं थी। लेकिन विजयी होने के लिये वे संघर्ष करते थे, समझौते नहीं। इस मामले में वे स्वाभिमानी थे। आत्मसम्मान के प्रश्न पर वे व्यक्तिगत बड़ी से बड़ी हानि स्वीकार कर सकते थे, लेकिन झुक नहीं सकते थे। उन दिनों वे भी राजनीति के दाँवपेंच  चल सकते थे। लेकिन उन्होंने मुम्बई में निर्वासन स्वीकार कर लिया, समझौता नहीं किया।
                       

महाराजा हरि सिंह ने मुम्बई में निष्कासित हो जाने के बावजूद  "अपने पूर्वकाल के बारे में कभी भी सार्वजनिक रुप से न बोलने का निश्चय किया। अपने पूर्वकाल के बारे में व्यक्तिगत बातचीत में भी उन्होंने शायद ही कभी ज़िक्र किया हो।उन्होंने कभी औपचारिक रुप से प्रैस वार्ता भी नहीं की, न ही सार्वजनिक रुप से उस काल के बारे में पत्र व्यवहार किया और न ही कोई डायरी लिखी। "(Christopher Thomas, Faultline kashmir,66) .   इसे महाराजा हरि सिंह की महानता ही मानना होगा कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर पर चल रही बहस से लेकर जीवन के अंतिम दिनों तक व्यक्तिगत मान अपमान की चिन्ता न करते हुये , राष्ट्र हित के लिये मौन रहना ही श्रेयस्कार समझा। वे इन सभी घातों प्रतिघातों को चुपचाप सहते व झेलते रहे। मुम्बई में अपमान के इस विष को पीते रहे लेकिन उन्होंने अन्तिम श्वास तक अपना मुँह नहीं खोला। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की तरह किसी मोहम्मद युसफ टेंग को पास बिठा कर अपनी जीवनी भी नहीं लिखवाई। मुम्बई में टेंगों की कमी तो नहीं थी। लेकिन यदि हरि सिंह किसी टेंग को पास बिठा लेते तो यक़ीनन दूसरे लोग इतिहास के कटघरे में खड़े होते। उनको कटघरे में खड़ा करने की बजाय हरि सिंह ने ख़ुद कटघरे में खड़ा होना स्वीकार कर लिया।  उनका मुँह खुलने से हो सकता दूसरे अनेकों मुँह बन्द हो जाते और कईयों के चेहरे से नक़ाब उतर जाते।  लेकिन हरि सिंह ने यह सारा ज़हर स्वयं ही पिया और चुपचाप इस संसार को अलविदा कह दिया।

मुम्बई के फ़्रेडी स्टिलमैन और उसकी पत्नी बैरी महाराजा के जानने वालों में से थे। यह दम्पत्ति मुम्बई के बायकुला क्लब के सदस्य थे और महाराजा को वहाँ अपने अतिथि के रुप में आने के लिये निमंत्रित करता रहता था। इस क्लब में आम भारतीयों का प्रवेश वर्जित था। "महाराजा हर बार कोई न कोई कारण बता कर विनम्रता से इन्कार कर देते थे। एक बार फ़्रेडी ज़्यादा ही ज़ोर डालने लगे। तब महाराजा ने उतने ही ज़ोर से कहा , यदि तुम्हारा क्लब आम भारतीयों के लिये वर्जित है तो वह मेरे भी किसी काम का नहीं है।"( Christopher Thomas, Faultline kashmir, p 100)




 

 

 

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