महाराजा हरि सिंह और उनकी अंतिम यात्रा

21 Sep 2017 10:07:29

 


डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में महाराजा हरि सिंह नितान्त अकेले थे। अपने भीतर खोए रहने वाले अन्तर्मुखी हरि सिंह। उनकी पत्नी उनको छोड़ गई थी या फिर महाराजा ने उसको छोड़ दिया था। उनका बेटा उनको गुज़रे ज़माने की चीज़ मान कर नये ज़माने में खो गया था। अब उनके घोड़े ही उनके परिवार का अंग बन गये थे। वे उन्हें बच्चों की तरह प्यार करते थे। जब उनका कोई घोड़ा रेसकोर्स में जीत जाता,तो इससे उन्हें भी क्षण भर के लिये अपने जीतने की अनुभूति हो जाती थी। हरि भवन की छटी मंज़िल पर बैठे वे घंटों सोचते रहते। नितान्त अकेले। रात देर तक जागते रहते। कई बार आधी रात को उठ बैठते। नौकरों को भी जगा देते। ऐसी एक नहीं सैकड़ों स्मृतियां हरि भवन में काम करने वालों के ज़ेहन में सुरक्षित हैं और अन्ततः एक दिन उनके साथ ही दफ़न हो जायेंगी। एक बार "रात गहराती जा रही थी लेकिन महाराजा को नींद नहीं आ रही थी। रात के दो बज गये थे। उन्होंने कैप्टन दीवान सिंह को बुलाया और काफ़ी लाने के लिये कहा। फिर ऊँची आबाज में बोलने लगे, मानों स्वयं को ही कह रहे हों, मैं राजा से बेहतर,एक प्रधानमंत्री सिद्ध हो सकता था।"(  Christopher Thomas, Faultline kashmir,p 67)      एक दिन दीवान सिंह को  बुलाकर बोले "मैं उस ढर्रे से मुक्त होकर ही सुखी हूँ।"( Christopher Thomas, Faultline kashmir,p 66)   लेकिन यह वास्तव में हरि सिंह का हरि सिंह से ही सम्वाद था। मुम्बई में बैठकर वे शायद अात्मविश्लेषण भी कर रहे थे। मुम्बई में बस उनका एक ही शौक़ बचा था रेस कोर्स का। या फिर सिगरेट थी जिसको वे अभी तक छोड़ नहीं पाए थे।

 "उनके जीवन के अंतिम वर्ष,बिगड़ते स्वास्थ्य और विवादग्रस्त मनोवेगों से अभिशप्त होते जा रहे थे।------ नौकर चाकर तुनुकमिजाज होते जा रहे महाराजा के समय असमय के आदेशों पर भागते रहते थे। ------ ज़िन्दगी भर उन्हें नफ़ासत पसन्द थी। लेकिन हास्य व्यंग्य को पकड़ पाने की वृत्ति कमज़ोर थी। महाराजा अब अपनी इन्हीं मनोवृत्तियों के कारण निकटस्थ लोगों के लिये भय का कारण बन रहे थे। ------ अब वे व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने लगे थे। उनकी गर्दन पर कई छेदों वाला फोड़ा उग आया था। वे मधुमेह से ग्रस्त हो गये थे। टीके की सुई से उन्हें बचपन से ही डर लगता था। इसलिये इस उम्र में भी टीका लगाने का विरोध करते थे। ---------- दिन में एक बार वे लिफ़्ट से नीचे आते। उन्हें सहारा देकर कार में बिठाया जाता। वे अश्वशाला में रेस के अपने प्रिय घोड़ों को देखने के लिये जाते थे। उनके भूरे और सुनहरी घोड़ों को, मुम्बई में घुडदौड के सभी शौक़ीन पहचानते थे। --------- लेकिन अब हरि सिंह के इस प्रकार आने जाने में किसी की रत्ती भर भी रुचि नहीं बची थी। इतिहास में उनका स्थान निर्धारित करने के लिये बहुत बारीकी से चीर फाड़ कर ली गई थी और अब उसमें ऐसा कुछ नहीं बचा था जिसको जानने में किसी की रुचि बनी रहे। ---- हरि भवन की छटी मंज़िल पर हरि सिंह एक ऐसे नीरस व्यक्ति बन गए थे,जो क्षीण होती जा रही  काया के साथ साथ स्वयं भी इतिहास में विलुप्ति की ओर बढ़ रहे थे।"( Christopher Thomas, Faultline kashmir,p 69-70)
                           

1961 के अप्रेल मास में उनके सुपुत्र कर्ण सिंह अपनी पत्नी के साथ विदेश प्रवास पर निकलने वाले थे। लंदन जाने से पहले वे मुम्बई अपने पिता से मिलने पहुँचे। महाराजा हरि सिंह की उमर 66 साल हो चुकी थी। यह कोई बहुत ज़्यादा उम्र तो नहीं कहीं जा सकती। लेकिन जीवन भर झंझावातों से अकेले ही जूझते रहने के कारण वे बूढ़े हो चले थे। बीमार भी रहने लगे थे। मधुमेह उन्हें भीतर से खोखला कर रहा था। चलना फिरना भी मुश्किल हो गया था। लेकिन टीके से इतना डरते थे कि इंसुलीन की सुई नहीं लगवाते थे। भीतर के समस्त दर्द और वेदना को भीतर ही भीतर सहते हुये वे ऊपर से प्रसन्न दिखाई देने का प्रयास कर रहे थे। जिस ने सारी उम्र अपना दर्द किसी से नहीं बाँटा, वे भला अब जीवन के इस अंतिम मोड़ पर अपना दुख किसी से क्यों बाँटते ? लेकिन महाराजा हरि सिंह की दशा अब किसी व्याख्या की मोहताज नहीं थी। पर ऊपर से वे सामान्य बने रहने का हर संभव प्रयास कर रहे थे। उन्होंने विदेश यात्रा पर जा रहे अपने बेटे को उन चीज़ों की सूची लिखाई जो बाहर से उनके लिये लानीं थीं। उन्होंने "मैनचेस्टर टैरियर का एक जोड़ा लाने के विस्तृत निर्देश दिये। उन्होंने हाल ही में इन कुत्तों के बारे में पढ़ा था कि स्काटलैंड में बेहतरीन टैरियर मिलते हैं। उन्हें 8 x30 बी की दूरबीन भी चाहिये थी।"(.  कर्ण सिंह, आत्मकथा,पृ० 257)      लेकिन उनके भीतर के दर्द को और कोई समझता चाहे न समझता, सुदूर नेपाल से आई कर्ण सिंह की पत्नी की संवेदनशील आँखें इसे समझ गईं थीं। उसने कहा भी,"बापूजी, यदि आपकी तबीयत ठीक नहीं हैं तो हम अपनी विदेश यात्रा रद्द कर देते हैं। महाराजा ने उदास मन से कहा, नहीं बेटे तुम लोग जाओ। "(.  Somnath Wakhlu,Hari Singh: The Maharaja, the Man, the Times, p 253)      कर्ण सिंह पाँच दिन अपने पिता के पास ठहरे और फिर इस सूची को संभालते हुये अपनी विदेश यात्रा पर निकल गये।
             

काफ़ी मेहनत से उन्होंने अपने पिता के लिये टैरियर कुत्तों का वह जोड़ा तो खोज लिया लेकिन उसे अपने सचिव "दीवान इक़बाल नाथ के पास लंदन में ही छोड़ दिया ताकि वे उन्हें उनके पिता को सौंप दें "(.  कर्ण सिंह, आत्मकथा 257)   क्योंकि ख़ुद उनका कार्यक्रम रोम से नेपल्स जाने का था। वे अपनी पत्नी सहित 24 अप्रेल को रोम पहुँचे। लेकिन उनका मन शायद बेचैन ही था। उधर 24 अप्रेल को भोर में पाकिस्तान की जानी मानी गायिका मलिका पुखराज को स्वप्न आया। मल्लिका पुखराज महाराजा हरि सिंह के दरबार में नृत्यांगना रह चुकी थी। भारत विभाजन के समय वह पाकिस्तान चली गई थीं। उसी के शब्दों में," महाराजा हरि सिंह अपने दरबार में बैठे हैं। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, जम्मू बहुत ही सुन्दर है। है न ? हाँ बहुत ही सुन्दर है - मैंने कहा। क्या तुम जानती हो कि मैं अब जम्मू जा रहा हूँ ? महाराजा ने कहा और उसके साथ ही मल्लिका पुखराज का सपना टूट गया। " (Malka Pukhraj, Song sung true,p 221)
                   

कहते हैं भोर का सपना सच होता है। 24 अप्रेल को स्वप्न में हरि सिंह मलिका पुखराज को जम्मू जाने के बारे में बताते हैं और उसके दो दिन बाद ही अकेले अपनी महायात्रा की तैयारी में जुट जाते हैं। वे शायद जम्मू ही तो जा रहे थे। लेकिन साकार रुप में नहीं निराकार रुप में। क्या इसे संयोग ही कहा जायेगा कि उनकी इस महायात्रा के समय उनके अपने परिवार का कोई भी उनके पास नहीं था। वे नितान्त अकेले थे।  उनके साथ 1949 से ही मुम्बई में छाया की तरह रहने वाले कैप्टन दीवान सिंह भी किसी काम से बाहर गये हुये थे। 1961 की अप्रेल का २६वाँ दिन था। सुबह सुबह महाराजा को खाँसी का दौरा पड़ा। खाँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इसी खाँसी से उन्हें दिल का दौरा पड़ गया।  उनके ह्रदय ने आज तक न जाने कितने आघात सहे थे। शायद वह भी अब थक चुका था। तुरन्त डाक्टर को बुलाया गया। डाक्टर ने टीका लगाया। सारी उम्र टीके से डरने वाले हरि सिंह में अब इस टीके का विरोध करने की हिम्मत भी नहीं बची थी। लेकिन अब शायद उन्होंने स्वयं भी नियति से समझौता कर लिया था। उन्होंने डाक्टर की ओर देख कर कहा, डाक्टर मैं जा रहा हूँ। और एक आध घंटे बाद वे सचमुच चले गये। लेफ्टीनेंट जनरल हिज हाईनैस श्रीमान राजराजेश्वर महाराजाधिराज श्री सर हरि सिंह इन्द्र महेन्द्र बहादुर सिपार-ए-सल्तनत महाराजा जम्मू कश्मीर अब इस संसार में नहीं रहे थे। डाक्टर निस्तब्ध खड़ा था। लम्बे समय से महाराजा का साथ निभाने वाले कर्मचारी, जो अब एक प्रकार से उनके परिवार के ही अंग बन गये थे, आँखों में आँसू भरे निष्प्राण हो चुके हरि सिंह के शरीर को देख रहे थे। कुछ देर बाद दूर इटली की राजधानी रोम के एक होटल में टेलीफ़ोन की घंटी बजी। इस होटल के एक कमरे में महाराजा हरि सिंह के सुपुत्र कर्ण सिंह अपनी पत्नी के साथ थे और रोम घूमने का कार्यक्रम बना रहे थे। इटली में भारतीय राजदूत एस.एन.हक्सर उनसे मिलने के लिये होटल आ रहे थे। जब कर्ण सिंह उनसे हाथ मिला चुके तो हक्सर ने कहा,"आपके लिये एक बुरी ख़बर है। आपके पिता का देहान्त हो गया है।"(कर्ण सिंह, आत्मकथा,पृ० 258)
                             

रोम में कर्ण सिंह को महाराजा हरि सिंह के देहान्त का समाचार एक कश्मीरी एस एन हक्सर ने दिया, उधर जम्मू के डोगरों को देहान्त का यह समाचार आकाशवाणी के जम्मू केन्द्र ने दिया। "ज्यों ज्यों लोगों को ख़बर मिलती गई, अपने आप वे दुकानों बंद करने लगे। इसके लिये किसी ने कहा नहीं था। लेकिन देखते देखते सभी बाज़ार बंद हो गये। दूर दराज़ के इलाक़ों में स्थित दुकानें भी बन्द होने लगीं। अश्रुपूरित नेत्रों से लोग घरों से निकल निकल कर बाज़ारों में आ रहे थे। लेकिन वे अपना दुख किसके पास जाकर व्यक्त करें ? राज परिवार का तो कोई भी व्यक्ति जम्मू में नहीं था। कर्ण सिंह पत्नी समेत रोम में थे और महारानी तारा देवी हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में थीं। लगता था कि सारा जम्मू शहर ही सड़कों पर निकल आया था। लेकिन लोग अपने शोक और दुख का इज़हार किसके सामने जाकर करें ? तब लोग अपने आप ही स्वप्रेरणा से पंडित प्रेमनाथ डोगरा के घर की ओर चल पड़े। पंडित जी प्रजा परिषद आन्दोलन के जन नायक थे। लोग पंडित जी से आग्रह कर रहे थे कि महाराजा का पार्थिव शरीर जम्मू लाने की व्यवस्था की जाये ताकि पूरे सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार किया जा सके। लेकिन महाराजा तो स्वयं ही एक साल पहले अपनी वसीयत में इसकी मनाही कर गये थे। अब लोग चुपचाप राजमहल की ओर चल पड़े। लगता था जम्मू के सब मार्ग केवल राजमहल की ओर ही जा रहे हों। राजमहल के आगे चारों ओर लोगों का समुद्र लहरें मार रहा था। लेकिन राजमहल तो ख़ाली पड़ा था। फिर भी अपने दिवंगत महाराजा के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिये वहाँ सारा जम्मू नतमस्तक था। कुछ देर राजमहल के आगे रुकने के बाद शोकाकुल लोग तवी नदी स्थित श्मशान घाट की ओर चल पड़े। घाट पर जन ज्वार उमड़ आया था। स्त्रियाँ विलाप कर रहीं थीं। लोगों के अपने महाराजा हरि सिंह अब इस संसार में नहीं थे। तवी के इस घाट पर तो इस समय उनका पार्थिव शरीर भी नहीं था। लेकिन फिर भी भीड़ का यह सागर तवी के श्मशान घाट पर उनके लिये शोकाकुल खड़ा था। प्रजा परिषद की ओर से राम नाथ एडवोकेट उठे और महाराजा को श्रद्धांजलि अर्पित की। लोग चुपचाप धीरे धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे थे।" ( Bhagwan Singh, Political conspiracies of Kashmir, p 10)
                 

उधर मुम्बई के हरि भवन में हरि सिंह के दाह संस्कार को लेकर विचार हो रहा था। कौन करेगा ? क्योंकि उनके परिवार का तो कोई व्यक्ति वहाँ नहीं था। लेकिन यदि होता भी तब भी इससे कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं था, क्योंकि अपनी वसीयत में उन्होंने अपने दाह संस्कार में अपने परिवार के सदस्यों को दूर रहने की हिदायत कर दी थी। शायद इस बात का आभास उनको पहले ही हो गया होगा। इस महायात्रा पर जाने से लगभग एक साल पहले ही उन्होंने 4 मार्च 1960 को अपना वसीयतनामा लिख दिया था और उसमें अपने अंतिम संस्कार को लेकर स्पष्ट निर्देश दे दिये थे। "मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को मेरा अन्तिम संस्कार एवं उससे जुड़ी प्रथाओं को करने की अनुमति नहीं दी जायेगी। मेरा अंतिम संस्कार आर्य समाज की रीति से, वसीयत के निष्पादकों द्वारा चयनित, किसी योग्य व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जायेगा।"(. Christopher Thomas, Faultline kashmir,p 64-65)  वसीयतनामा में ही निर्देश था कि उनका अंतिम संस्कार मुम्बई में ही किया जाये। लेकिन जम्मू को वे अब भी नहीं भूले थे। जम्मू उनकी रग  रग में समाया हुआ था। " मेरी अस्थियों को समुद्र में विसर्जित कर दिया जाये लेकिन मेरी राख को चाँदी के कलश में रखकर एक विशेष विमान द्वारा मेरी जन्म भूमि जम्मू शहर पर बिखरा दिया जाये। "(.कर्ण सिंह, आत्मकथा,पृ० 259)    जम्मू एवं कश्मीर से अनेक लोगों ने आग्रह किया कि महाराजा का शव वहाँ लाकर राज्य में ही उनका संस्कार किया जाये लेकिन महाराजा की अंतिम इच्छा को नकारना संभव नहीं था। इसे भी क्या नियति का संकेत ही माना जाये कि महाराजा की अंतिम इच्छा कि उनका संस्कार परिवार के किसी सदस्य को न करने दिया जाये, नियति ने ही पूरी कर दी। उनका संस्कार करने के लिये उनके परिवार का कोई सदस्य वहाँ मौजूद ही नहीं था। कर्ण सिंह के ही अनुसार,"अठ्ठाइस की अलसुबह हम मुम्बई पहुँच गये।--------- हमारे वहाँ पहुँचने के पहले ही संस्कार किया जा चुका था।"(. कर्ण सिंह, आत्मकथा,पृ० 258)    उनतीस अप्रैल को कर्ण सिंह चार्टड विमान डी.सी.३ से महाराजा हरि सिंह की राख के कलश को लेकर जम्मू पहुँचे। संयोग ही कहा जायेगा कि चार्टड विमान डी सी 3 से अप्रेल 1949 को महाराजा हरि सिंह दिल्ली गये थे। उस समय उनको पता नहीं था कि यह विमान उन्हें केवल छोड़ने आया है, उन्हें वापिस लेकर नहीं जायेगा। जम्मू कश्मीर में वापिस केवल कर्ण सिंह ही जायेंगे और वे चले भी गये थे। लेकिन आज अप्रेल 1961 में पूरे बारह वर्ष बाद कर्ण सिंह, महाराजा को लेकर वापिस जम्मू आ रहे थे। 1949 में जम्मू जाने के लिये छूटा डी सी 3 महाराजा को अन्ततः 1961 में मिला। लेकिन अब उसमें कलश में सिमटी उनकी राख ही बैठी थी।
             

आगे कर्ण सिंह के ही शब्दों में,"ज़मीन पर उतरने से पहले हमने तीन बार शहर का चक्कर लगा कर पिता की राख को नीचे की मिट्टी पर बिखरा दिया। मिट्टी, जिससे मनुष्य का जन्म होता है और अन्ततः वह उसी मिट्टी में मिल जाता है। पिता जी को श्रद्धांजलि देने के लिये पूरा शहर उमड़ आया था। उस व्यक्ति के लिये विलाप करते हुये विशाल भीड़ जमा थी, जो उनके महाराजा के रूप में बारह साल से भी पहले उन्हें छोड़ कर चला गया था। उस विशाल भीड़ के बीच एक खुली जीप में मैं कलश लेकर चल रहा था। -------- इस समय मैं अकेला था। परम्परा के अनुसार मेरी माँ ने विधवा के सफ़ेद वस्त्र पहन लिये थे और शोक करती महिलाओं के बीच वे अमर महल में अर्द्धमूर्छित अवस्था में पड़ी थीं। मेरे पिता के नाम पर बस कलश भर राख ही शेष थी, जिसे मैं अपने हाथों से हल्के से झुला रहा था। अंत में, मनुष्य का वज़न कितना रह जाता है।". (.   कर्ण सिंह, आत्मकथा,पृ० 259)      महाराजा हरि सिंह की शेष बची राख को उनकी इच्छानुसार तवी नदी की लहरों में विसर्जित करना था। शनिवार को अस्थिकलश जम्मू के रघुनाथ मंदिर में लोगों के दर्शन हेतु रखा गया। प्रथम मई सोमवार को  कर्ण सिंह ने अस्थिकलश तवी नदी में प्रवाहित कर दिया। लगता था सारा जम्मू शहर अपने राजा को अंतिम विदाई देने के लिये तवी तट पर आ गया हो। डोगरा वंश के अन्तिम राजा के जीवन का पटाक्षेप हो गया।
                 

लेकिन जम्मू में नये बने सचिवालय भवन पर राज्य का ध्वज, सरकार ने इस अवसर पर भी झुकाना उचित नहीं समझा। लोगों में इस बात को लेकर काफी गुस्सा था। कुछ विद्यार्थी सचिवालय भवन पहुंच गये और राज्य ध्वज झुकाने की मांग करने लगे। मांग न मानी जाने पर उन्होंने बलपूर्वक सचिवालय में घुसने का प्रयास किया। पुलिस ने  गोली चला दी। लेकिन सौभाग्यवश कोई घायल नहीं हुआ। बहुत मुश्किल से भीड पर काबू पाया जा सका।

           

महाराजा हरि सिंह ने वसीयत कर दी थी कि उनकी मृत्यु के बाद किसी प्रकार के अनुष्ठान न किये जायें। (वैसे उनके परिवार ने या फिर वसीयत के न्यासियों ने अभी तक इस वसीयत को सार्वजनिक नहीं किया है) अपने परिवार के सदस्यों को तो उन्होंने अपने दाह संस्कार तक में भाग लेने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन इसके बावजूद कर्ण सिंह ने ये अनुष्ठान करना अपना कर्तव्य समझा। " हालाँकि मेरे पिता की वसीयत में लिखा था कि अन्य कोई धार्मिक अनुष्ठान न किया जाये, फिर भी मैंने इसे अपना फ़र्ज़ समझा कि कि मैं शास्त्रानुसार तेरहवीं का अनुष्ठान करुं। इसके तहत अनेक प्रकार की पूजा की जाती है। ज़मीन पर सोना पड़ता है। दिन में एक बार शाकाहारी भोजन करना होता है और दाढी नहीं बनानी होती।" (कर्ण सिंह, आत्मकथा पृ० 259)    आश्चर्य है कि जिस कर्ण सिंह ने मुम्बई जाने से पहले माता पिता की यज्ञोपवीत संस्कार की इच्छा को पूर्ण करने के लिये, उस समय केश मुंडन की परम्परा का निर्वाह, भारी दबाव के चलते भी नकार दिया था, वही कर्ण सिंह वसीयत में मना किये जाने के बावजूद महाराजा हरि सिंह की तेरहवीं करने को अपना कर्तव्य बता रहे थे।   जब महाराजा हरि सिंह ज़िन्दा थे तो कर्ण सिंह ने  'रीजैंट न बनने' के उनके आदेश को नहीं माना और जब हरि सिंह इस संसार से चले गये तो कर्ण सिंह ने,'मेरे धार्मिक अनुष्ठान न किये जायें ' के दिये गये उनके आदेश को नहीं माना। संसार की गति विचित्र  है।

महाराजा हरि सिंह चले गये थे और मुम्बई का हरि भवन अब उदास और अकेला था। वहाँ से सभी के जाने का वक्त आ गया था। कैप्टन दीवान सिंह का भी, जो अंतिम क्षणों तक महाराजा के साथ साये की तरह रहे थे। उन नौकरों चाकरों का भी जिन्हें महाराजा अब अपना असली परिवार मानते थे। महाराजा ने अपनी वसीयत में सभी के साथ नीर क्षीर न्याय किया था। वैसे भी सिंहासनारुढ  होते समय उन्होंने संकल्प लिया था। न्याय ही मेरा धर्म है। अपनी वसीयत में उन्होंने सभी नौकरों को, जितने साल उन्होंने नौकरी की थी, प्रत्येक साल के एवज़ में तीन महीने की अतिरिक्त तनख़्वाह दी। उच्च पदस्थ सहायकों को क़ीमती मकान और बहुमूल्य उपहार दिये गये। अपने बेटे और पत्नी को उनकी वसीयत के अनुसार "पहले ही जो व्यवस्था की गई है, उससे उन्हें पर्याप्त मिल गया है। वैसे भी मैंने अपने जीवन काल में उन्हें जो क़ीमती उपहार दिये हैं, उनसे ही काफ़ी आमदन हो सकती है। "(  Christopher Thomas, Faultline kashmir,p 70)  उनकी जम्मू के नागबणी में एक स्कूल खोले जाने की इच्छा थी। अपनी वसीयत में स्कूल खोलने के लिये उन्होंने," मुम्बई के मैसर्ज काँगा  एंड कम्पनी के वरिष्ठ सदस्य श्री त्रिकमदास द्वारिकादास को, यदि किसी कारण से उनके लिये सम्भव न हो सके, तो कम्पनी के अगले वरिष्ठ सदस्य एवं नई दिल्ली स्थित डी.ए.वी कालिज प्रबन्ध समिति के न्यासियों को नियुक्त किया।"(Somnath Wakhlu,Hari Singh: The Maharaja, the Man, the Times, p 254)

हरि सिंह के प्रथम जीवनीकार सोमनाथ वाखलु ने बहुत बाद में लिखा, "कुल मिला कर महाराजा हरि सिंह का जीवन एक त्रासदी कही जा सकती है। यह ठीक है कि किसी विरोधी ने सीज़र की तरह उनकी सीधे सीधे हत्या नहीं की। लेकिन उन्हें इतना घायल और  अपमानित किया गया,उनको परेशान किया गया और उनके साथ इतना दुर्व्यवहार किया गया कि वे मधुमेह के शिकार हो गये। कालान्तर में मधुमेह, तनावों के कारण बढ़ता गया और ह्रदयाघात के कारण उनकी मृत्यु हो गई।"(.Somnath Wakhlu,Hari Singh: The Maharaja, the Man, the Times, p 243)   कई साल बाद जम्मू की ही पद्मा सचदेव ने अपने उपन्यास 'जम्मू जो कभी शहर था' में महाराजा की मृत्यु पर,उपन्यास की नायिका सुग्गी नाईन के माध्यम से लिखा "देखो विधाता ने क्या किया। जुगराज और जुगरानी दोनों विदेश में थे। महारानी काँगड़ा में थीं और कप्तान दीवान सिंह को भी महाराजा ने कहीं भेजा हुआ था। बस, अपने दो चार नौकर ही थे। डाक्टर को महाराजा साहेब ने कहा था -मैं जा रहा हूँ डाक्टर। यह कह कर सुग्गी की आँखें भर आईं। बैसाखी के दिन थे। उदास भरे। खबर आ गई, महारानी तारादेवी काँगड़ा से आ रही हैं। मोटरें चल पड़ी हैं। जुगराज और जुगरानी भी आ गये थे, पर संस्कार तो हो ही चुका था। जुगराज उनकी भस्म लेकर आये। महाराजा की इच्छा के मुताबिक़ भस्म जम्मू की पहाड़ियों पर, पीर पंचाल पर और तवी में बिखरा दी गई। सुग्गी विलाप करने लगी, ओ जम्मू के राजा,अन्त में आपको अपनी मिट्टी भी न मिली। जिन्होंने आपको देस निकाला दिया, उनको कीड़े पड़ेंगे। (  पद्मा सचदेव, जम्मू जो कभी शहर था, पृ० 186)  सुग्गी का यह प्रलाप प्रकारान्तर से समस्त डोगरा समाज की महाराजा हरि सिंह को श्रद्धांजलि थी। "उस समय महाराजा हरि सिंह का निष्कासन डोगरा सम्मान का जानबूझकर किया गया अपमान माना जा रहा था। सुग्गी का प्रलाप, उन लोगों के ख़िलाफ़, जो महाराजा हरि सिंह के निर्वासन के लिये ज़िम्मेदार थे, क्रोध की अभिव्यक्ति है।"( ओम गोस्वामी, पद्मा सचदेव,पृ० 71)
                                   

महाराजा अपनी वसीयत में जम्मू में एक विद्यालय खोलने का निर्देश दे गये थे। ऐसा स्कूल जिसमें ग़रीबों के बच्चे बिना शुल्क के पढ़ ही न सकें बल्कि जीवनयापन के लिये कृषि कार्य से सम्बंधित ज्ञान भी प्राप्त कर सकें। उसी के अनुसार जम्मू से दस किलोमीटर दूर नागबनी में 'महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कालजिएट स्कूल प्रारम्भ किया गया। 1967में न्यासियों ने यह स्कूल नई दिल्ली की डी.ए.वी प्रबन्ध समिति के हवाले कर दिया गया। स्कूल का अपना भव्य भवन है। उसका अपना छात्रावास भी है। स्कूल का शिक्षा स्तर भी उत्तम ही कहा जा सकता है। लेकिन स्कूल निशुल्क शिक्षा नहीं देता। अलबत्ता फ़ीस मुआफ़ी का प्रावधान तो जैसा अन्य स्कूलों में होता है, वैसा यहाँ भी है। कुछ अनाथ बच्चों को भी निशुल्क पढ़ाया जाता है। लेकिन महाराजा की इच्छा के अनुसार कम से कम कृषि की शिक्षा यहाँ नहीं दी जाती। एग्रीकल्चर  स्कूल लिखते समय शायद महाराजा की इच्छा रही होगी कि विद्यार्थी उन्नत खेती के तौर तरीक़े सीख कर खेती में सुधार लायें। महाराजा हरि सिंह के वारिसों ने स्कूल में कभी रुचि नहीं ली। लेकिन इसे जम्मू की भाषा में यह भी कह दिया जाता है कि उन्होंने कभी इसमें दख़लन्दाज़ी नहीं की। जब तक कैप्टन दीवान सिंह ज़िन्दा थे तब तक वे स्थानीय समिति के अध्यक्ष भी थे और महाराजा हरि सिंह की निशानी मान कर स्कूल की सार संभाल भी करते थे। लेकिन कैप्टन साहिब के स्वर्गवास से महाराजा हरि सिंह और महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कालिजिएट स्कूल के बीच की वह अन्तिम कड़ी भी समाप्त हो गई।
                   

महाराजा हरि सिंह इस संसार से चले गये थे। जम्मू कश्मीर को देश के संघीय संविधान का अंग बना देने के बाद वे मुम्बई में निष्कासित जीवन बिताने के लिये बाध्य किये गये। अब वे उस बंधन से भी मुक्त थे। उनकी राख जम्मू कश्मीर की मिट्टी में मिल गई थी। लेकिन हरि सिंह को भारत माता का एक और ऋण अभी भी चुकाना था। उनके देहमुक्त हो जाने के डेढ़ साल बाद चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। देश गंभीर संकट में से गुज़र रहा था। हथियार ख़रीदने के लिये पैसा चाहिये था। डोगरा राजवंश का नौ मन सोने का राज सिंहासन रियासत में रखा था। इस स्वर्ण सिंहासन पर अंतिम बार महाराजा हरि सिंह ही बैठे थे। अब देश को स्वर्ण भंडार की आवश्यकता थी। राज्य के मुख्यमंत्री बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद डोगरा राजवंश का यह स्वर्ण सिंहासन दिल्ली जाकर भारत के वित्तमंत्री मोरारजी देसाई को दे आये। पितृपक्ष में जन्मे हरि सिंह मानो इस दान से मातृभूमि के ऋण से भी मुक्त हो गये।

               

26 अप्रेल 1961 को महाराजा हरि सिंह ने अंतिम साँस ली। उसके बाद जम्मू कश्मीर ने अनेक उतार चढ़ाव देखे। जम्मू कश्मीर को छीनने के लिये पाकिस्तान ने तीन तीन लडाईयां लड़ लीं। नेहरू भी इस नश्वर संसार से विदा हो गये और उनके बाद शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला भी। इतिहास पर विस्मृति की न जानें कितनी परतें जमती गईं। उनकी मृत्यु के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी ने भी पचास बसंत देख लिये। लेकिन जम्मू कश्मीर की जनता के दिमाग़ से नहीं विस्मृत हो पाईं  महाराजा हरि सिंह की यादें। वे कश्मीर की घाटियों में, जम्मू के मैदानों में, लद्दाख के पठारों में और दरदों के दर्द में कहीं न कहीं छाये रहे। इतिहास की संगोष्ठियों में, राजनीति की बहसों मे छाया की तरह घूमते रहे। वे जम्मू कश्मीर के लिये अप्रासांगिक नहीं हो पाये। जम्मू के डोगरों को एक दर्द सालता ही रहा। उनके अपने राजा को, उनके अपने घर में चिर निद्रा में सो जाने के लिये भी एक कोना नसीब नहीं हो पाया। म्यांमार की जेल में क़ैद, भारत  के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम  में भाग लेने वाले बहादुर शाह ज़फ़र ने कभी लिखा था-
                                   

                                                   कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफन के लिए,
                                                     दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥

 


महाराजा हरि सिंह के लिये मुम्बई ही रंगून बन गया था। वे अपने घर से दूर हो गये थे। वक़्त के सत्ताधीशों ने उन्हें, उनके कू-ए-यार से निष्कासित कर दिया था। बहादुर शाह ज़फ़र शायरी से अपने आप को अभिव्यक्त करते थे, लेकिन हरि सिंह अपने भागते हुए अश्वों को दूर तक देखते हुए अपनी पीड़ा को अन्दर ही अन्दर समा लेते थे।  ज़फ़र को विदेशी शासकों ने जलावतन किया था,  हरि सिंह अपनी ही सरकार का दिया हुआ दर्द भोगने को अभिशप्त थे। लेकिन जम्मू के उनके अपने लोग इतने साल बाद भी उनको भुला नहीं पा रहे थे। वे हरि सिंह से किये गये व्यवहार से स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। अन्ततः उन्होंने अपने महाराजा के इस संसार से चले जाने के पूरे पाँच दशक बाद प्रथम अप्रेल 2012 को उनकी भव्य मूर्ति तवी नदी के सेतु पर स्थापित करके स्वयं को उऋण किया। यह महाराजा की घर वापिसी थी।

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