संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के कठपुतली प्रधानमंत्री ने फिर झूट का सहारा लिया

25 Sep 2017 20:02:35

 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी 

 

शुभम उपाध्याय

हाल ही में हुए संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक अधिवेशन में पाकिस्तान ने एक बार फिर जम्मू कश्मीर का मुद्दा प्रमुखता से उठाया है। अब तो यह पहले से तय रहता है कि पाकिस्तान का कोई भी प्रधानमंत्री हो, यदि संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते हैं तो जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठाएंगे ही। पिछले 70 साल से पाकिस्तान लगातार संयुक्त राष्ट्र में जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठा रहा है लेकिन हर बार की तरह वो इस बार भी नाकाम ही रहा। 70 सालों में पूरी दुनिया समझ चुकी है कि पाकिस्तान की हर दलील झूठ की बुनियाद पर टिकी हुई है। जिस एजेंडे को लेकर पाकिस्तान दुनिया के सामने अपना प्रोपगंडा चलाना चाहता था उसे अब सिरे से नकार दिया गया है। चाहे वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हो या पाकिस्तान के राजनयिक अपनी झूठी रिपोर्ट और हल्के भाषणों से जम्मू कश्मीर के बारे में झूठ फैलाते आये हैं। इस बार भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी अपने झूठ का सहारा लेकर भाषण पढ़ते गए जो कि पूरी तरह बेअसर रहा।

 

पाकिस्तान आज तक संयुक्त राष्ट्र के जिस प्रस्ताव की बात करता आया है उसमें भी उसने हमेशा झूठ का ही सहारा लिया है। जिस तरह कहा जाता है कि 'खग की भाषा खग ही जाने' उसी तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और भारत में बैठे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को लेकर एक जैसी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। दरअसल इन्होंने इस प्रस्ताव को लेकर एक नयी भाषा और लिपी इजात कर ली है। जिस तरह हिंदी को बाएं से दाएं और उर्दू को दाएं से बाएं लिखा जाता है उसी तरह इनकी नई भाषा में प्रस्ताव को उल्टा अर्थात नीचे से ऊपर पढ़ा जाता है। अब हैं पाकिस्तान के तो उल्टे ही होंगे। खैर संयुक्त राष्ट्र और इनकी नई भाषा का पूरा मसला यह है कि संयुक्त राष्ट्र में जब जम्मू कश्मीर का मामला गया था तब संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों के बीच मामले के समझौते के लिए एक प्रस्ताव रखा था जिसमें 6 बातें थी -

 

  1. पाकिस्तान बिना किसी शर्त के जम्मू कश्मीर के पुरे भाग से अपनी फ़ौज हटाएगा, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने यह साफ़ तौर से माना कि जम्मू कश्मीर के किसी भी भाग में पाकिस्तान की फ़ौज अवैध है।

 

  1. आज़ाद जम्मू कश्मीर की सरकार और वहाँ की सेना के साथ साथ पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (पीओजेके) की सेना को पूरी तरह हटाकर भंग किया जाए, ये पूरी तरह से गैरकानूनी है।

 

  1. जम्मू कश्मीर की क्षेत्रीय अखंडता को दोबारा स्थापित किया जाये, ठीक उसी तरह जिस तरह 15 अगस्त 1947 में महाराजा हरि सिंह के शासन के दौरान था।

 

  1. पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र मीरपुर, गिलगिट, बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद जैसे अन्य क्षेत्रों भगाए और भागे गए शरणार्थियों को वापस उनके घरों में बसाया जाये। लगभग 2 लाख से अधिक लोग सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की वजह से तात्कालिक समय में विस्थापित होकर भारतीय क्षेत्र में आये थे।

 

  1. जम्मू कश्मीर के क़ानूनी दर्जे में कोई विवाद नहीं है इस वजह से भारत जरुरत के हिसाब से जम्मू कश्मीर में अपनी सेना या सुरक्षा बलों को रख सकता है। भारतीय सेना के जम्मू कश्मीर में रहने को वैध बताते हुए संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया था कि जम्मू कश्मीर 100% भारत का हिस्सा है। साथ ही यह भी कहा था कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर से अपनी सेना हटाये और भारत अपनी सेना रख सकता है।

 

  1. अंतिम बिंदु पर संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि जनमत संग्रह भारत का आंतरिक मसला है। संयुक्त राष्ट्र ने इतना ही कहा कि जनमत संग्रह के लिए पर्यवेक्षक की भूमिका निभा सकता है। भारत ने इसमें सहमति देते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र जनमत संग्रह के लिए आयुक्त ला सकता है किन्तु वह जम्मू कश्मीर सरकार के अधीन अपना कार्य करेगा।

 

इन सभी प्रस्तावों को स्वीकारने से पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने अपनी 3 शर्ते रखीं थी। जो कुछ इस प्रकार थी -

 

  1. सीज़फायर पर विराम
  2. युद्ध विराम संधि
  3. जनमत संग्रह

साथ ही इसमें यह भी कहा गया था कि यदि पाकिस्तान पहले या दूसरे नियम का उल्लंघन करता है तो भारत तीसरे नियम (जनमत संग्रह) के लिए बाध्य नहीं होगा। पाकिस्तान लगातार उपरोक्त नियमों के उल्लंघन करता रहा। भारत जम्मू कश्मीर क्षेत्र में विकास चाहता था किन्तु इन परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था। लंबे समय तक इंतजार के बाद भारत ने 1956 में वी पी मेमन के भाषण द्वारा यह स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि "जो दो शर्तें पूरी करनी थी उसके लिए भारत और लंबे समय तक इंतजार नहीं कर सकता था, भारत को जम्मू कश्मीर के क्षेत्र में विकास करना था इसलिए भारत ने जम्मू कश्मीर में चुनाव करवाये जिसमें वहाँ की जनता ने विलय को भरपूर समर्थन दिया।" इससे स्पष्ट होता है कि आज वर्तमान में जम्मू कश्मीर में जनमत के मुद्दें को लेकर किसी भी तरह की बात संयुक्त राष्ट्र या किसी भी अन्य अंतराष्ट्रीय मंच में उठाना बेबुनियाद है। वहीं जम्मू कश्मीर के संविधान में धारा 3 में स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ है कि 'जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।'

 

 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, राजनयिक और भारत में बैठे अलगाववादी हमेशा से जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करते हैं लेकिन जनमत संग्रह से पहले की मुख्य शर्तों को हमेशा भूल जाते हैं। इसीलिए हमने कहा कि इन्होंने नई भाषा और लिपि इजात की है, नीचे से ऊपर पढ़ने की, उल्टा पढ़ने की।

 

वहीं संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मालीहा लोधी ने जम्मू कश्मीर को लेकर अपने प्रोपगंडा के तहत एक और झूठ का सहारा लिया। मालीहा लोधी ने गाजा में हुए हमले में घायल एक स्त्री की तस्वीर को जम्मू कश्मीर की महिला बताकर दुनिया के सामने खुले तौर पर झूठ बोलते हुए पकड़ाई गयी। जम्मू कश्मीर में पैलेट गन से घायल महिला के रूप में उन्होंने इस तस्वीर को पेश किया था जो की पाकिस्तान के पूर्व बयानों और रिपोर्टों की तरह पूरी तरह से बेबुनियाद था

 

तो मुद्दा यह है कि संयुक्त राष्ट्र में आकर हमेशा से झूठ बोलने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और राजनयिक पहले इन प्रस्तावों और नियमों को खुद कभी नहीं पढ़ते या फ़ो सकता है उन्हें पढ़ने भी नहीं दिया गया हो। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में आकर आक्रामक भाषण देने के नाटक करने से और दुनिया को झूठ दिखाने से सच नहीं छुपता है। क्योंकि ऐसे दिखावेबाजी वाले भाषणों से कम पढ़े लिखे पाकिस्तानी तो खुश हो जायेंगे लेकिन दुनिया के बुद्धिजीवी वर्ग और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर हमेशा मुँह की ही खानी पड़ेगी। वैसे भी वर्तमान में पाकिस्तान में एक अंतरिम सरकार है और प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी मात्र कठपुतली प्रधानमंत्री हैं। इन्हें पाकिस्तान में अभी गंभीर रूप से नहीं लिया जा रहा है तो दुनिया कैसे लेगी। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा लिखित भाषण को संयुक्त राष्ट्र में पढ़ने मात्र का काम ही था इनका जिसको भी वो अच्छे से नहीं कर पाये।

 

पाकिस्तान की इन बेबुनियाद आरोपो और झूठी दलीलों से स्पष्ट होता है कि जिसका देश ही झूठ की बुनियाद पर बना हो वो कभी सच बात नहीं कर सकता।

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