भारतवर्ष के उत्कृष्ट मन्दिरों में से एक है कश्मीर के राजा अवन्तिवर्मन् का अवन्तिस्वामिन् मन्दिर

11 Jan 2018 12:58:07

 


डा. मयंक शेखर

राजतरंगिणी के अनुसार (4/716) सुखवर्मन् के पुत्र अवन्तिवर्मन् का राज्याभिषेक 855 ई. में हुआ था । अवन्तिवर्मन् ने कश्मीर में उत्पलक वंश की स्थापना की । राज्याभिषेक के कुछ वर्ष पूर्व उसने अवन्तिस्वामिन् मन्दिर का निर्माण किया था । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अवन्तिस्वामिन् मन्दिर का निर्माण सम्भवतः 850 ई. में हुआ होगा ।

राजतरंगिणी के अनुसार, विश्वैकसार क्षेत्र में  (जिसमें अपने प्राणों का त्याग करने वाले परम पद को प्राप्त करते हैं) कश्मीर के राजा अवन्तिवर्मन् (855-883 A.D.) ने “अवन्तिपुर” नगर की स्थापना की थी । 

क्षेत्रे विश्वैकसाराख्ये मृतानामपवर्गदे ।

                             भूरिभोगास्पदं राज्ञा तेनावन्तिपुरं कृतम् ॥ राजतरंगिणी 5.44

इस अवन्तिपुर नगरी में अपने राज्याभिषेक के पूर्व अवन्तिवर्मन् ने भगवान् विष्णु का “अवन्तिस्वामिन्” के रूप में एक मन्दिर का निर्माण किया एवं राज्य प्राप्त कर लेने के पश्चात् भगवान् शिव का “अवन्तीश्वर” के रूप में एक मन्दिर का निर्माण किया ।

अवन्तिस्वामिनं तत्र प्राग्राज्याधिगमात्कृती ।

                       विधाय प्राप्तसाम्राज्यश्चक्रेवन्तीश्वरं तदा ॥  राजतरंगिणी 5.45

हम सभी यह जानते हैं कि राजा अवन्तिवर्मन् के ही दरबार में मुक्ताकण, शिवस्वामी, आनन्दवर्धन, एवं रत्नाकर प्रभृति विद्वान् उपस्थित थे । ये वहीं आनन्दवर्धन थे जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र को एक नवीन दिशा दी । भारतीय साहित्यशास्त्र का “ध्वनि” सिद्धान्त आनन्दवर्धन की ही उद्भावना है।

                               मुक्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः ।

                   प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः ॥ राजतरंगिणी 5.34

अवन्तिपुर नगर आज का “वन्तिपुरा” (पुलवामा जिले में) है जो वितस्ता के दक्षिणी तट पर स्थित है । इस मन्दिर का प्रथम उत्खनन जगदीश चन्द्र चटर्जी के नेतृत्व में 1910 में किया गया था । यह उत्खनन मात्र 6-7 फीट नीचे तक ही हो पाया था । इस खुदाई में कुछ खण्डित मूर्तियाँ, सिक्के, एवं पाण्डुलिपि प्राप्त हुए थे । इस मन्दिर का बृहत् रूप से उत्खनन दयाराम साहनी के नेतृत्व में 1913 में हुआ । उत्खनन का विस्तृत रिपोर्ट Annual report of the archaeological survey of India 1913-14 under title 'Excavations at Avantipur' के नाम से प्रकाशित हुआ ।

 

यह मन्दिर कोलोनैन्डेड स्तम्भ-पंक्ति एवं प्रशस्त आँगन जिसकी लम्बाई 174 फीट एवं चौडाई 148 फीट है, से युक्त है । बीच में मन्दिर का मुख्य या केन्द्रीय भवन है जो दो प्रतिष्ठा-आधारों पर बना है । इस केन्द्रीय कक्ष में मन्दिर के मुख्य देवता विष्णु का “अवन्तिस्वामिन्” के रूप में मूर्ति था जो अब श्रीनगर के प्रताप सिंह म्यूजियम में देखा जा सकता है ।  चारों कोनों पर एक-एक छोटे मन्दिर थे जो पार्श्व देवता को समर्पित हैं । इस मन्दिर के स्तम्भों पर भी प्रचुर मात्रा में अलंकरण किया गया है । मन्दिर के प्रांगण में देवता का एक पीठ (आसन) भी देखने को मिलता है । कश्मीर में पीठ का वास्तुकला की दृष्टि से अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । पीठ का निर्माण, मूर्ति-निर्माण के समान ही पवित्र माना गया है । एक आमलक भी प्रांगण में पडा हुआ है । आमलक मन्दिरों के शीर्ष पर रहने वाले कलश को आधार प्रदान करता है । आमलक वृत्ताकार होता है।

अवन्तिस्वामिन् मन्दिर का मुखद्वार पूर्व दिशा में है । आँगन की परिधि के चारों ओर व्यवस्थित कोठरियों सहित क्रमिक छतदार परिस्तंभ और एक भव्य द्वार है। मन्दिर के प्रवेश द्वार एवं केन्द्रीय मन्दिर के मध्य स्तम्भयुक्त मण्डप था जिसमें गरूड़ध्वज लगा था । यह गरुडध्वज आज भी विराजमान है । विष्णु के मन्दिर में प्रतीकात्मक रूप से गरुडध्वज की स्थापना होती है, क्योकि गरुड विष्णु के वाहन है । इस प्रकार, गरुडध्वज भगवान् विष्णु के मन्दिर का एक अभिन्न अंग है । इस मंदिर में उत्कृष्ट भव्य मूर्तियाँ बनी हुई हैं जो वास्तुशिल्प और मूर्तिकला का अद्भुत संगम है ।

बाहरी भवन के स्तम्भ-द्वारों पर गंगा (दायीं स्तम्भ पर ) एवं यमुना (बायीं स्तम्भ पर) की प्रतिमायें हैं जो अपने वाहन घडियाल (मकर) एवं कच्छप से आसानी से पहचानी जा सकती हैं ।

बाहरी भवन की दीवारों पर मिथुन की प्रतिमायें भी देखने को मिलती है जो प्रत्येक भारतीय मन्दिरों का एक अभिन्न भाग रहा है । केन्द्रीय मन्दिर के प्रवेश-द्वार के दोनों स्तम्भों पर अलंकृत प्रतिमायें देखने को मिलती हैं ।  दोनों द्वार-स्तम्भ के आयताकार पैनल में सम्भवतः राजा अवन्तिवर्मन अपनी पत्नियों के साथ विराजमान है । कुछ लोगों का मानना है कि इसमें कामदेव अपनी पत्नियों के साथ विराजमान हैं । केन्द्रीय भवन के दक्षिण दीवार पर राजा अवन्तिवर्मन् अभयमुद्रा (भय से मुक्ति दिलाने की मुद्रा) में विराजमान हैं । केन्द्रीय भवन में एक पैनल पर हाथी व मनुष्यों की प्रतिमा है ।

इस मन्दिर की बहुत सारी मूर्तियाँ श्रीनगर के श्री प्रताप सिंह म्युजियम में स्थानान्तरित की गयी है। इस म्यूजियम में भगवान् विष्णु की अद्भुत प्रतिमायें हैं जो भारतीय मूर्तिकला के अनूठे उदाहरण हैं।

चित्र (४) भगवान् विष्णु की अद्भुत प्रतिमायें जो अब श्रीप्रताप सिंह संग्रहालय, श्रीनगर में संरक्षित हैं ।

 

14 वीं शताब्दी के अन्त में सिकन्दर (बुतसिकन) द्वारा अवन्तिपुर के दोनों मन्दिर अर्थात् अवन्तिस्वामिन् एवं अवन्तीश्वर, नष्ट कर दिये गये ।

The temples of Avantipur was destroyed at the end of the 14th century A.D. by Sikandar, nicknamed Butshikan. (pp-61) Dayaram Sahni in Annual report of the archaeological survey of India 1913-14 under title 'Excavations at Avantipur'.

 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अवन्तिस्वामिन् मन्दिर न केवल कश्मीर अपितु भारतीय स्थापत्य व मूर्त्ति कला की उत्कृष्टतम कृतियों में से एक है। मुस्लिम शासक सिकन्दर बुतसिकन द्वारा नष्ट करने की कोशिश के बावजूद, यह मन्दिर अपने अवशेषों के द्वारा अपनी विराट महत्ता को आज भी द्योतित कर रहा है। हमारा यह सौभाग्य है कि हमारे पास अवन्तिवर्मन् जैसे राजा की थाती है किन्तु आज उनकी सिर्फ स्मृति मात्र शेष है; और यह स्मृति गौरव की स्मृति है, श्रद्धा की स्मृति है । 

 

 

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