फिर से शुरू हो शारदापीठ की ऐतिहासिक यात्रा 

17 Jan 2018 13:30:55


 आशुतोष मिश्रा

एक बार फिर से कश्मीरी हिन्दुओं ने शारदापीठ की ऐतिहासिक यात्रा शुरू करवाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया हैं। ये प्राचीन शारदा पीठ पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में स्थित है।  प्राचीन शारदा पीठ के लिए यात्रा की सुविधा देने के लिए राज्य और केंद्र सरकारों पर दबाव अब बढ़ रहा है।

जम्मू कश्मीर की ऑल पार्टिस  माइग्रेंट कोऑर्डिनेशन कमेटी के साथ कई अन्य संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जम्मू कश्मीर राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को पाकिस्तान के साथ मामले पर बात करने और शारदा पीठ में हिंदू तीर्थयात्री की यात्रा की सुविधा प्रदान कराने के लिए एक एक संयुक्त अपील की। और जितनी जल्दी हो सके 'कारवां-ए-अमन'बस से तीर्थ यात्रा शुरू करें।

यह इस पूरे क्षेत्र में बने हुए मंदिर हिंदुओं के है। 1947 से पहले दुनिया भर से हिंदू इस मंदिर की यात्रा करते थे, यहां तक ​​कि दुनिया भर के बौद्ध भिक्षु भी इस मंदिर की यात्रा करते थे। आज भी लोग पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में अपने रिश्तेदारों से मिलने परमिट लेकर उनसे मिलने जा रहे थे। इसलिए अगर सरकार पाकिस्तान की सरकार के साथ बात करके हिंदू को इस मंदिर तक जाने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती है?

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर की नीलम घाटी में अथमकुम में मुजफ्फराबाद से 207 किमी उत्तर में स्थित शारदा पीठ किशन गंगा नदी और मुधुमती धारा के संगम के पर स्थित है। मंदिर की स्थापना की वास्तविक तारीख ज्ञात नहीं है, हालांकि वर्तमान में मंदिर की शैली को देख कर लगता है की राजा ललितादित्य ने 724 ईस्वी में इसका नया निर्माण किया था।

आजादी से पहले, प्राचीन काल से शारदा मंदिर की वार्षिक यात्रा का आयोजन किया गया था। उसके बाद से शारदा पीठ की यात्रा 1948 से बंद पड़ी हुई है। यह यात्रा वार्षिक तौर पर अगस्त में होती रही है। यह कश्मीर से कुपवाड़ा के रास्ते से पकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के मुजफ्फराबाद जाती थी। देश की आजादी से पहले इस यात्रा का संचालन जम्मू कश्मीर के डोगरा शासक करते रहे है। 1846 में डोगरा शासन के दौरान यह एक नियमित बन गई थी। ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि 273 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक की अवधि के दौरान शारदा पीठ के नाम से बौद्ध विश्वविद्यालय स्थापित किया गया था।

आखिरी बार इस तीर्थ की यात्रा 1947 में कुपवाड़ा के टिक्कर निवासी स्वामी नंदलाल जी द्वारा की गई थी। देश के समय विभाजन के समय स्वामी नंदलाल ने शारदा से मूर्तियों को घोड़े की पीठ पर टिक्कर कुपवाड़ा तक ले आया गया  था। आज भी बारामूला के देवबल में और कुपवाड़ा के टिक्कर में भी कुछ पत्थर की मूर्तियां भी रखी हैं।

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