जम्मू-कश्मीर और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

17 Jan 2018 13:00:38

 


 

प्रश्न: पाकिस्तानी आक्रमण संबंधी चर्चा के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव की मुख्य बात क्या है?

उत्तर: संयुक्त राष्ट्र ने अपने प्रस्ताव में 6 बिन्दुओं पर बात की। इसमें पहले ही बिन्दु में पाकिस्तान को यह स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया था कि वह जम्मू-कश्मीर से अपनी सेना हटा ले।

संयुक्त राष्ट्र की स्पष्ट मान्यता थी कि जम्मू-कश्मीर के किसी भी हिस्से में पाकिस्तान की उपस्थिति अवैध है। सुरक्षा परिषद का मत था कि आजाद जम्मू-कश्मीर सरकार और आजाद जम्मू-कश्मीर सेना, जिनका अस्तित्व पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर में था, को भंग किया जाना चाहिए। यह दोनों गैर-कानूनी है। जम्मू-कश्मीर की भू-भागीय अखंडता को पूरी तरह से बहाल किया जाना चाहिए। इसकी स्थिति वैसे ही होनी चाहिए जैसा कि महाराज हरिसिंह द्वारा शासित जम्मू कश्मीर की स्थिति 15 अगस्त 1947 तक थी।

सुरक्षा परिषद की मान्यता थी कि पाकिस्तानी घुसपैठ के कारण जिन लोगों को मीरपुर, गिलगित, बल्तिस्तान और मुजफ्फरबाद से विस्थापित होना पड़ा था उनकी पुनर्वापसी होनी चाहिए। पाकिस्तानी कबाइलियों और सेना के सांप्रदायिक और हिंसात्मक आक्रमण के कारण इन क्षेत्रों से 2 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित होना पडा था। इन क्षेत्रों में 26 अक्टूबर 1947 तक भारत का शासन था।

 

अपने प्रस्ताव में सुरक्षा परिषद ने कहा कि भारत जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की आवश्यक संख्या को बनाए रखेगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर की विधिक स्थिति के बारे में किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति नहीं है। विश्व में यदि कहीं भी विवाद की स्थिति पैदा होती है तो संयुक्त राष्ट्र अपनी सेनाओं की तैनाती करता है और वहां पर किसी भी विवादित पक्ष की सेना की तैनाती की अनुमति संयुक्त राष्ट्र द्वारा नहीं दिया जाता है। भारतीय सेना को ठहरने की अनुमति के द्वारा सुरक्षा परिषद ने इस बारे में स्पष्ट संदेश दिया था कि जम्मू-कश्मीर शत्-प्रतिशत भारतीय भू-भाग है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्रस्ताव में भारत को अपनी सेना रखने और पाकिस्तान को अपनी सेना हटाने के लिए कहा गया है। साझा सेना के बारे में कोई संकेत नहीं दिया गया था।

 

 

 प्रश्न: क्या इस प्रस्ताव में जनमत संग्रह का भी उल्लेख किया था?

उत्तर: जनमत संग्रह, भारत की जम्मू-कश्मीर के लोगों से आंतरिक प्रतिबद्धता थी। संयुक्त राष्ट्र ने यह पूछे जाने पर कि क्या जनमत संग्रह संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षण में किया जा सकता है भारत ने इस पर सकारात्मक जवाब दिया था। संयुक्त राष्ट्र के जनमत संग्रह आयोग की नियुक्ति के बारे में अपनी सहमति दे दी है। लेकिन आयुक्त को अपना काम जम्मू-कश्मीर सरकार के अधीन रहना था।

 

 

प्रश्न: क्या भारत ने संयुक्त राष्ट्र के जनमत संग्रह प्रस्ताव के लिए कोई पूर्व शर्त रखी थी?

उत्तर: भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले एक पूर्व शर्त रखी थी संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव तीन समूह में विभक्त होगा। पहला भाग युद्ध विराम से संबंधित था दूसरा स्थिति के बारे में था और अंतिम भाग जनमत संग्रह के बारे में है पाकिस्तान द्वारा पहली दो शर्तों को अस्वीकृत किया जाने की स्थिति में प्रस्ताव का तीसरा भाग भारत के लिए बाध्यकारी नहीं था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के स्पष्ट भारतीय रुख को यूएनसीआईपी के अध्यक्ष डॉ. लोजानो ने स्वीकार किया था। 21 और 22 दिसम्बर 1948 को डॉ. लोजानो को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था- आयोग द्वारा 13  अगस्त को पारित प्रस्ताव का पहला और दूसरा भाग पूरी तरह कार्यान्वित नहीं होने की स्थिति में भारत आयोग के जनमत संग्रह की प्रस्ताव मानने की स्थिति में नहीं होगा।

 

 

प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को पाकिस्तान द्वारा न माने ​​जाने की शिकायत भारत ने क्यों नहीं किया?

 

उत्तर: ऐसा नहीं है। भारत ने कई बार इस मामले को यूएनसीआईपी के ध्यान में लाने की कोशिश की थी, लेकिन कई सारी शिकायतों के बावजूद पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के पहले दो प्रस्तावों को स्वीकार किया।  इसलिए भारत ने 1953 में इस अध्याय को बंद कर दिया और इसके बारे में संयुक्त राष्ट्र को सूचित किया गया। 1972 में शिमला समझौते द्वारा इसे अधिकृत रूप से द्पक्षीय बनाया गया था। भारत और पाकिस्तान के बीच में शिमला समझौते में यह सहमति बनी हुई थी कि दोनों पक्षों के बीच परस्पर विवादों को द्पक्षीय बातचीत के माध्यम से सुलझाएंगे।

 

 

प्रश्न: इस मामले को बंद करने के दौरान क्या भारत ने संयुक्त राष्ट्र को बताया?

 

उत्तर: पहले यह कहा गया है कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के बारे में अपनी वादे को निभाया है। भारत इस मामले को लेकर अनंत काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता। भारत ने 1948  में संयुक्त राष्ट्र को यह बता दिया कि भारत सरकार जनमत संग्रह के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन कश्मीर की वर्तमान स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा कराना जाना मुश्किल है। इस तरह की स्थिति में जनभावनाओं को जानने के लिए दूसरे तरीकों को खोजा जाना चाहिए। अगस्त-सितंबर 1951 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के लिए निर्वाचन कराये गये जिनमें से शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के सभी 75 सदस्य जीते। पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में यह चुनाव संभव नहीं थे। लोकतांत्रिक चुनावों के द्वारा जनमत संग्रह कराने के लिए अपने वादे को भारत ने निभाया। 15 फरवरी 1954 को संविधान सभा के सदस्यों ने सर्वसम्मति से भारत में जम्मू-कश्मीर की विलय की पुष्टि की।

भारत ने यह भी पाया कि उस समय तुर्की, ईराक, ईरान, अर्जेन्टीना, सीरिया, इटली, ऑस्ट्रेलिया,कनाडा और इंग्लैंड आदि सुरक्षा परिषद के अधिकांश सदस्य बगदाद पैक्ट के जरिये पाकिस्तान के सहयोगी बन गए। भारत ने यह मान लिया है कि सुरक्षा परिषद अब तटस्थ मंच नहीं बचा है और अब उससे निष्पक्षता की आशा नहीं की जा सकती।

 

 

प्रश्न: इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान दृष्टिकोण क्या है?

उत्तर: शिमला समझौते के द्वारा हमने यह फैसला किया था कि दोनों देश सभी मुद्दों पर आपसी बातचीत के माध्यम से निपटने की कोशिश करेंगे, इसमें तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं होगी। इस समझौते के बाद अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष कोई विवाद लंबित नहीं है। इसकी पुष्टि अलग-अलग समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ के पिछले तीन महासाचिवों ने किया है। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र में यह मामला बीसवीं सदी के छठे दशक में ही समाप्त हो गया था।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बुतरस घाली ने 1991 में और कोफी अन्नान ने 1998 में पाकिस्तान की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान पाकिस्तानी पत्राकारों के साथ बातचीत करते हुए कहा- संयुक्त राष्ट्र की चार्टर के अनुसार यदि दो प्रतिद्वन्दी राष्ट्रों को किसी तरह के द्पक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया जाता है जिनके माध्यम से जनजीवन सामान्य है और शांति पुनर्विकास के लिए और समझौते का अनुमोदन दोनों देशों की विधायिका द्वारा कर दिया जाता है। तो ऐसे समझौते के साथ ही संयुक्त राष्ट्र की भूमिका समाप्त हो जाती है और पूर्व में संयुक्त राष्ट्र संघ या उसके किसी भी घटक द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव रद्द किए गए हैं।

 

 

प्रश्न: यदि 6  फरवरी 1954 को जम्मू-कश्मीर के लोगों द्वारा चयनित संविधान सभा द्वारा भारत में विलय के अनुमोदन के द्वारा जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी मूल प्रतिबद्धता को पूरी कर दिया तो आज तक अधिकांश लोग जनमत संग्रह की बात क्यों है?

उत्तर: सामान्य सी बात है, निहित स्वार्थों में सम्मिलित पक्षों द्वारा चलाया जा रहा है विकृत सूचना अभियान के कारण ऐसा हो रहा है। इसके अलावा सूचनाओं के अभाव और मीडिया में आने वाली अपुष्ट जानकारी के कारण भी ऐसा हो रहा है। जनमत संग्रह की बात तो यही है क्योंकि राष्ट्रवादी लोगों और अकादमिक लोगों द्वारा प्रामाणिक शोधों का अभाव है।

 

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