जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख का वर्तमान परिदृश्य और आगामी दिशा

20 Jan 2018 14:13:13

संवाद


 

 

 

हम सबको जम्मू कश्मीर को एक अलग दृष्टिकोण से देखने और समझने का मौका मिला हैं। कभी-कभी लोग प्रश्न करते है कि जम्मू कश्मीर की स्थिति क्या है? तो हमेशा कहता हूं कि वर्तमान समय भारत का है और भारत को यह समय खोना नहीं है। इतिहास में दो समय भारत के थे और दो समय ऐसे थे जो पाकिस्तान के थे। भारत और पाकिस्तान दोनों चूक गए। 1947 में जम्मू कश्मीर के विषय को लेकर कोई संशय नहीं था, फिर भी हम क्यों चूक गए? एक कार्य जिसको करने की जरूरत है वह यह कि जम्मू कश्मीर को चार लोगों से मुक्त करना चाहिए। नेहरू, शेख अब्दुल्ला, हरि सिंह और माउंटबेटन। हम इन्हीं चार में घूमते रहते है। इनमें सबसे आखिरी जो थे शेख अब्दुल्ला वर्ष 1982 में चले गए। अब किसने क्या किया, क्या कहा, किसको क्या कहना है, क्या बोलना है इन सारी बातों में बहुत कुछ रखा नहीं है। वर्ष 2014 के आधार पर, वर्ष 2017 के आधार पर हमको सोचना है। फिर भारत का समय 1971 में था। We can dictate all of our terms. शायद वह ताकत हमारी उस समय नहीं रही होगी। हम कुछ नहीं कर पाये होंगे, लेकिन हमारा समय था, हम बहुत कुछ कर सकते थे। कम से कम पाकिस्तान से जीते हुए क्षेत्र तो हमको वापस नहीं करना चाहिए था। भौगोलिक रूप से कुछ आगे भी जा सकते थे। दो समय पाकिस्तान के भी थे, एक 1950 से लेकर 1953-54 के समय भारत कमजोर था। भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव में था। दुनियां की शक्तियां हमारे विरोधियों के साथ थी। शेख उनके हस्तक बन चुके थे। इतना कमजोर देश का नेतृत्व और किसी कालखंड में नहीं था। सरदार पटेल जा चुके थे। कांग्रेस में रहे अच्छे-अच्छे लोग बाहर हो गये थे। और दूसरा समय जो हमारा बहुत कठिन था वह 1989-90 से 1994 तक का था। उस कालखंड में भी जम्मू कश्मीर को लेकर जितना अंतरराष्ट्रीय दबाव हमारे ऊपर था उतना कभी नहीं था। सन् 1947, 1971 में हम चूके और 1950 से 1953-54 और 1990 से 1994 में पाकिस्तान चूक गया। अब 2017 ये हमारा समय है और जब यह कहता हूं तो केवल उत्साह बढ़ाने के लिए नहीं कहता। जम्मू कश्मीर में 1990 से 2000 तक आतंकवाद चरम पर था। वह आतंकवाद की पराकाष्ठा थी। ये बुरहान वानी और ये सब ट्वीटर, सोशल मीडिया के माध्यम से आइकॉन बनने की जो कोशिश कर रहे है, ये वो आतंकवाद नहीं है जिस आतंकवाद को हमने 1990 से 2000 के बीच में लड़ा है और जीता है। उस आतंकवाद से लड़ाई तो हम जीत चुके है। आज अलगाववादी शक्तियां हारी हुई मानसिकता में है। 2008 अमरनाथ का आंदोलन जम्मू कश्मीर का टर्निंग पाइंट था। राष्ट्रवादी शक्तियां जितनी आज मजबूत हैं इतनी कभी नहीं थी। कश्मीर के अंदर अलगाववादी शक्तियां इतनी बंटी हुई, इतनी हारी हुई मानसिकता में जितनी आज है इतनी कभी नहीं थी। जम्मू कश्मीर की लड़ाई को अलगाववाद के नाम पर, आतंकवाद के नाम पर, कट्टरवाद के नाम पर पाकिस्ता‍न ने लड़ने की कोशिश की। लड़ाई का हथियार कभी कट्टरवाद बनता है, कभी अलगाववाद बनता है, कभी आतंकवाद बनता है, ये हथियार बनते है और ये हथियार पाकिस्तान के थे। पाकिस्तान जितना कमजोर आज है इतना कभी नहीं था। कितने साल पाकिस्तान रहेगा, इसको लेकर भी लोग कई बार शर्त लगाने के लिए तैयार हो जाते है और बहुत लोग तो ये मानते हैं कि पाकिस्ता‍न तब तक है जब तक भारत चाहता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जम्मू कश्मीर को लेकर भारत के विरुद्ध जो षड्यंत्र थे वे अब क्षीण हो चुके है। आज सारी दुनिया की ताकतें हमारे साथ हैं। ये जो पिछले दिनों सारा प्रकरण चला, उस कालखंड में विश्व पटल पर पाकिस्तान जितना अलग थलग पड़ा उतना पहले कभी नहीं हुआ था। आज उनका पूरा मीडिया इसी बात को लेकर परेशान है। उनके राजनीतिक दल बड़े परेशान है। लेकिन हमारी समस्या ये है कि हम अपने माइंडसेट में ही चले जा रहे है। उससे हम बाहर ही नहीं आना चाहते।

प्रायः जम्मू कश्मीर को लेकर जो विषय बार-बार उठाये जाते है। जैसे महाराजा हरि सिंह आजाद रहना चाहते थे, बीजेपी, कांग्रेस, हिन्दू बहुसंख्यक, मुस्लिम बहुसंख्यक, यह सब वास्तविक विषय नहीं है। ये जम्मू कश्मीर को लेकर जो कुछ हुआ इसका संबंध बीजेपी-कांग्रेस, हिन्दू-मुसलमान, हरि सिंह के निर्णय, विलय में देरी ये इन सब से कुछ लेना-देना नहीं है। Post second world war scenario में अंग्रेजों के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न था कि Post independence of india, How to serve the british interest. उन्होंने प्लान किया, उस प्लॉन के अनुसार उनको लगता था कि Strong stable Pakistan is in interest of British and for strong and stable Pakistan Jammu and Kashmir must go to Pakistan. ये उनका एक सीधा-सीधा प्लान था। 26 अक्टूबर 1947 को जिस दिन महाराजा हरि सिंह ने भारत में जम्मू कश्मीर का विलय किया उसी दिन अंग्रेजों का यह प्लान विफल हो गया। Post second world war scenario में भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर का सामरिक महत्व था। जम्मू कश्मीर से टर्की तक अंग्रेजों ने चीन और रूस के प्रसार को रोकने के लिए एक इस्लामिक वॉल बनाना चाहती थी। जम्मू कश्मीर का महत्व जिसके कारण से है उसके कारण से जम्मू कश्मीर पाकिस्तान के पास जाना चाहिए। आज जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के पास है वह नहीं होता पेशावर, इस्लामाबाद, लाहौर और स्यालकोट ये सब शहर भारत की रेंज में थे। बलूचिस्तान पाकिस्तान में जाना ही नहीं चाहता था। पूरा जम्मू कश्मीर हमारे पास होता तो शायद बलूचिस्तान भी पाकिस्तान में नहीं जाता, तो पाकिस्तान ही नहीं बनता। बिना जम्मू कश्मीर के strong and stable पाकिस्तान नहीं हो सकता था। हमारा दुर्भाग्य था कि पाकिस्तान 1947 में जो आक्रमण किया वह लड़ाई दुनियां में लड़ी जाने वाली लड़ाईयों में से एक अनोखी लड़ाई है, वो एक ही हुई अब दोबारा नहीं होगी। दो देश लड़ रहे थे दोनों देश के सेनापति तीसरे देश के थे। दोनों तरफ युद्ध चल रहा था और हमारी स्थिति तो और भी विचित्र थी। हमारी जो केबिनेट डिफेंस कमेटी थी, जिसमें 7 मेंबर थे, 7 में से 4 अंग्रेज और उसको हेड कर रहे थे माउंटबेटन। जनरल मानेक शॉ ने अपने बॉयोग्राफी में लिखा है कि एक युद्ध के मैदान में दुश्मन से लड़ रहे थे दूसरा अपने हेडक्वार्टर से लड़ रहे थे। भारतीय सेना 11 नवंबर तक उरी तक पहुंच गई थी। बहुत बार हम कहते हैं कि सेनाओं को रोक दिया, किसने रोक दिया? 14 महीने बाद सीजफायर हुआ। 14 महीने हम युद्ध लड़ते रहे, हम आगे बढ़े ही नहीं, बढ़ने ही नहीं दिया गया। मानेक शॉ अपनी बॉयोग्राफी में लिखते हैं कि लार्ड माउंटबेटन किसी शादी में एक महीने की छुट्टी पर गये। पीछे हमने प्लान बनाया, अपनी सेनाओं को बढ़ा दिया उरी से पुंछ और पुंछ से राजौरी मार्ग फरवरी-अप्रैल के महीने में ये सब आजाद करा लिया। जब हम उरी आजाद करा सकते थे, मार्च में पूंछ आजाद करा सकते थे, अप्रैल में राजौरी आजाद करा सकते थे, फिर मुजफ्फराबाद क्यों नहीं आजाद करा सकते थे? हमारी सेनाएं लद्दाख की तरफ बढ़ सकती थी हम स्कार्दू से आगे क्यों नहीं जा सकते थे। वास्तव में अंग्रेजों को ध्यान में आ गया कि जम्मू कश्मीर के अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर हो चुके है। वैधानिक रूप से जम्मू कश्मीर स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन चुका है। अब कम से कम ऐसा क्षेत्र जो जम्मू‍ कश्मीर का सामरिक महत्व का क्षेत्र है वो तो पाकिस्तान के पास रहे तब उन्होंने पूरा षड्यंत्र रचा और इस षड्यंत्र का परिणाम है कि जम्मू कश्मीर का महत्वपूर्ण क्षेत्र जिसमें मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित और बल्तिस्तान पकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया। यह पूरा क्षेत्र पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के नाम से जाना जाता है। संयुक्त राष्ट्र में भी अंतरराष्ट्रीय शक्तियों ने अपना षड्यंत्र जारी रखा। यदि आप संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की कार्यवाही का निरपेक्ष रूप से अध्ययन करे तो सब स्पष्ट हो जाता है। यह हमको बहुत बाद ध्यान में आया। हम एक ख्वाबों की दुनिया में रहने वाले लोग थे और उसी के अंतर्गत हमने उस बात का भरोसा कर लिया। लेकिन ये सब हुआ बाद में हमको ध्यान आया कि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान के पास भी जा सकता तो एलओसी को इंटरनेशनल बॉर्डर बना सकते हैं क्या? फिर ये सोच शुरू हो गई फिर जो पाकिस्तान के पास है फिर जो भारत के पास है वह भारत के पास है। लेकिन अभी दुनिया का परिदृष्य बदल रहा है, अभी दुनिया के आयाम बदल गए है। अभी चीन को लेकर बहुत बड़ी आशंका है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि 1963, 64, 65 में पाकिस्तान ने भारत के ऊपर दबाव बनाने के लिए रूस का इस्तेमाल किया था। पाक ने रूस से कहा था कि वो भारत के जीते हुए क्षेत्र को उसको वापिस दिला दें। पाकिस्तान ने रूस को लालच भी दिया कि वह उसको गिलगित क्षेत्र में आने देगा। लेकिन भारत उस समय भी रूस के दबाव में नहीं आया और पाकिस्तान का षड्यंत्र फेल हो गया। लेकिन आज के बदले हुए परिदृश्य में सारी दुनिया का ध्यान गिलगित और चीन के ऊपर है। चीन किसी भी तरह हिन्द महासागर तक पहुंचना चाहता है। चीन का एक्सपेंशन इंडो-ओसियन तक रोकना है तो सीपीईसी बनना नहीं चाहिए और इसलिए वर्तमान समय में वेस्ट और यूएस सब जगह सोच यह है कि All Jammu Kashmir, Including Gilgit Baltistan must come to India. यह वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर को लेकर वैश्विक परिदृश्य की बात है। आज का समय भारत का समय है। आज अलगाववादी शक्तियां हारी हुई मानसिकता में है। राष्ट्रवादी शक्तियां जम्मू कश्मीर में इतनी मजबूत कभी नहीं थी। देश के अंदर एक मजबूत सरकार है, ऐसी सरकार है जो निर्णय ले सकती है और उसका क्रियान्वयन भी कर सकती है।

भारत ने पाकिस्तान को कूटनीतिक तौर पर उत्तर दिया है। भारत केवल पीओजेके की बात की होती तो बात नहीं बनती भारत ने बलूचिस्तान की बात की। 2014 के बाद भारत ने उसको बताया कि जम्मू कश्मीर हमारा अंतरंग विषय है, अगर आप इसके बारे में बोलोगे तो हम बलूचिस्तान के बारे में बोलेंगे। अगर भारत केवल पीओजेके के बारे में बोलता तो कुछ होने वाला नहीं था। ये भारत का समय है, भारत को इस समय को खोना नहीं है। इसलिए डिबेट और डिस्कोर्स बदलिए। डिबेट और डिस्कोर्स के आयाम बदलिए। कुछ विषय है उनकी चर्चा करना व्यर्थ है। ये नेहरू, हरि सिंह इन सब से जम्मू कश्मीर को मुक्त कर दीजिए। इनकी चर्चा करना बंद कीजिए। 2016 की यूएन के अंदर भारत की विदेश मंत्री ने स्पष्ट तौर पर ऐतिहासिक भाषण दिया उन्होंने कहा “Jammu Kashmir is the integral part of india.” जम्मू कश्मीर को लेकर कुछ बातें सोचने और कुछ करने की है। उस लड़ाई के बहुत सारे आयाम हैं सुरक्षाबलों की अपनी भूमिका है जिसका निर्वहन उन्होंने बखूबी किया है, आज भी कर रहे हैं, और कल भी करेंगे। सुरक्षाबलों ने कभी भी भारत को जम्मू कश्मीर में नीचा नहीं किया। जम्मू कश्मीर की देशभक्त जनता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1947 में भी, 1952-53 में भी जब नेहरू शेख के सामने झुक गये थे। उन्होंने उनकी सब अलगाववादी मांगों के सामने घुटने टेक दिये। तब प्रजा परिषद् का मजबूत आंदोलन चला। गले में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का चित्र, एक हाथ में तिरंगा, एक हाथ में भारत का संविधान लिए जम्मू कश्मीर की देशभक्त जनता सड़कों पर उतर आयी। देश में एक विधान एक प्रधान एक संविधान रहेगा के नारों से जम्मू कश्मीर के साथ संपूर्ण राष्ट्र भी स्वतंत्र भारत के प्रथम आंदोलन का हिस्सा बना। ये जम्मू कश्मीर की लड़ाई हमने इसलिए जीती। 1965, 1971 के युद्ध के समय और आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षाबलों के रहने वाले सब लोगों को पता है कि जम्मू कश्मीर की देशभक्त जनता राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए कंधे से कंधा मिलाकर यत्न किये है। कठिनाइयों और अभावों के बीच रहकर भी लद्दाख की देशभक्त जनता ने वो चाहे देमचोक है, चाहे वह चुशुल है, सब जगह वहां के लोगों ने बखूबी हिम्मत से काम किया। आप कभी देमचोक गांव जाकर देखिए सिंधु नदी के उधर देमचोक का आधा हिस्सा चीन के अवैध कब्जे वाले हिस्से में पड़ता है वहां चीन ने 80 पक्के घर बनाये है जबकि भारत ने 80 कच्चे घर बनाये है। चीन ने उन 80 घरों तक आवागमन की सुविधा के लिए सड़क बनायी है। चीन ने भारत के हिस्सें वाले लोगों से कहा है कि आप लोग सिंधु नदी पार कर हमारे घर में आकर रहो। आपको चीन में कहीं भी आने का अधिकार रहेगा। मोबाइल, इंटरनेट जैसी सुविधायें आपको मुफ्त में मिलेंगी। वहां पर बिजली, सड़क, पानी, जैसी सुविधाएं है। जबकि भारत अपने उन नागरिकों को सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने में असफल है। चीन को यह मालूम है जिस दिन देमचोक के 80 परिवार चीन में आ गये, भारत का अगला गांव देमचोक से 40 किलोमीटर आगे है। लेकिन देमचोक के लोगों का अदम्य साहस एवं देशभक्ति ही है कि वहां के लोगों ने चीन के बहकावें में नहीं आये जिसके कारण से देमचोक भारत के पास है। इस जम्मू् कश्मीर की लड़ाई में सेनाओं ने अपनी भूमिका अदा की है बाकी देशभक्त जनता ने अपनी भूमिका अदा की है। देश के अंदर जम्मू कश्मीर को लेकर जो भाव है, ये भाव ऐसा भाव है जिस भाव के कारण कोई जम्मू कश्मीर को भारत से अलग होने को सपने में भी नहीं सोचेगा। वो अनपढ़ गरीब मां जिसने कभी जीवन में जम्मू कश्मीर नहीं देखा होगा, शायद जीवनपर्यन्त कभी वह जाना भी नहीं होगा, लेकिन उसके मन की भी भावना होती है कि बेटा बड़ा होगा, फौज में जायेगा, कश्मीर में लड़ेगा। इस भाव को लेकन एक बात हमको समझनी है ये भाव है जिस लड़ाई को हम लड़ रहे हैं इस लड़ाई को जीतना है, तो एक होलिस्टिक बैटल के रूप में हमें लड़ना पडेगा और होलिस्टिक बैटल के रूप में हमको करना क्या है, तो समय आ गया है कि इस जम्मू कश्मीर की लड़ाई में अब कश्मी‍री हिन्दू कश्मीर में वापस जाएं। कश्मीर में भारत को जाना है और हमको भारत को ले जाना है और उस भारत को ले जाने का जो तरीका है उसके साथ दो बातें बड़ी स्पष्ट हैं। एक वो कश्मीर से भारत चला कहां गया, जैसे ही वो हजारों साल की अपनी सांस्कृतिक विरासत से मेरा संबंध समाप्त होता है तो भारत को जाता है। वहां के जो आज रहने वाले लोग है उनको भी उस सांस्कृातिक विरासत का गर्व, उसका एक अहसास, उसका एक स्पर्श कराने की जरूरत है। उसके लिए हमको काम करना है। वो लोग हमारे, There also victoser वो एक विचारधारा के पीड़ित हो सकते है। वो अलगाववाद की विचाराधारा के पीड़ित हो सकते है, वो कट्टरवाद की विचारधारा के पीड़ित हो सकते है लेकिन वे हमारे लोग है ये बात हमारे ध्यान में रहनी चाहिए। उसके लिए अनेक प्रकार के काम हम सबको करने पड़ेंगे। दूसरी बात ये जो भारत को ले जाना बड़ा महत्वपूर्ण है सारे देश के अंदर हमें एक Progressive sistem विकसित करना है। देश अपना institutions खड़ा कर लिया है, हम भारत का संविधान पूरा ले गए, जम्मू कश्मीर में नहीं ले जा पाये, अपनी गलतियों से नहीं ले जा पाये। वहां पंचायती राज नहीं है, वहां Right to education नहीं है, वहां Right to information नहीं है। भारत का संविधान पूरा न होने के कारण से वहां Progressive governance नहीं आया है। governance में जनता की सहभागिता नहीं है। समाज में से जो स्वाभाविक नेतृत्व निकलना चाहिए था वह नहीं निकल रहा। देश की सब संस्थाओं  को, institutions को वहां पर जाना है, वहां के governance को सुधारने की आवश्यकता है। वहां पर भारत के institutions को ले जाने की आवश्यकता है। वास्तव में ये समय बहुत महत्वपूर्ण है। इस समय हमको इस लड़ाई को बहुत सारे पहलुओं पर लड़ना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऊपर जो कुछ हुआ उसके कारण से बहुत सी चीजें बिगड़ी। हमारा बहुत समय बीत गया, लेकिन आज का जो समय है ये भारत का समय है। इस भारत के समय को समझकर इस समय को हमको खोना नहीं है और इसके लिए इस देश के 125 करोड़ लोगों को खड़े होकर जम्मू कश्मीर के 120 लाख लोगों को अपने अंदर समेटने के लिए एक-एक कदम आगे बढ़ना है। इसके लिए प्रत्येक को कुछ भूमिका अदा करनी है वह भूमिका हम सब लोग तलाशें, इसके लिए देश के अंदर आप जैसे लोग एक वातावरण बनाएं।

 

 

 

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