कश्मीर के राजा शंकरवर्मन् द्वारा बनाये गये अद्भुत मन्दिर शंकरगौरीश एवं सुगन्धेश

20 Jan 2018 16:42:42

 


डा. मयंक शेखर

कल्हण के राजतरंगिणी के अनुसार, अवन्तिवर्मन् का पुत्र शंकरवर्मन् (883-909 ई.) ने दो शिव मन्दिरों का निर्माण कराया जिनके नाम क्रमशः शंकरगौरीश एवं सुगन्धेश थे, अपने द्वारा स्थापित किये गये नगर “शंकरपुरपत्तन” में किया था । शंकरपुरपत्तन (पत्तन) कश्मीर के वराहमूल (बारामूला) जिले में स्थित है।

तया समं पुरवरे सुरराजोपमो नृपः ।

     तस्मिञ्शंकरगौरीशसुगन्धेशौ विनिर्ममे ॥

       राजतरंगिणी 5. 158

अपने दिग्विजयी अभियान से लौटने के बाद शंकरवर्मन् ने पंचसत्र नगर के समीप में “शंकरपुर पत्तन” नाम के एक नगर की स्थापना की । कल्हण के समय (१२ वीं शताब्दी) से ही यह सिर्फ “पत्तन” के नाम से जाना जाता है । पत्तन शहर अपने वस्त्र-निर्माण एवं पशुओं के क्रय-विक्रय के बाजार के लिए प्रसिद्ध है ।

नाम्ना पत्तनमित्येव प्रख्यातं स्वपुरं कृतम् ।

  कस्यान्यस्याभिधाध्वंसि यथा शंकरवर्मणः ॥

      राजतरंगिणी 5. 213

इन दोनों मन्दिरों के बीच की दूरी एक मील से भी कम है । शंकरवर्मन् ने एक मन्दिर का निर्माण अपने नाम से (शंकरगौरीश मन्दिर) एवं दूसरे मन्दिर का निर्माण अपनी पत्नी सुगन्धा (सुगन्धेश मन्दिर) के नाम पर करवाया था । शंकरवर्मन् की पत्नी का नाम सुगन्धा था जो श्रीस्वामीराज (जो सम्भवतः दर्द राजा था) की पुत्री थी ।

इन दोनों मन्दिरों की देखरेख के लिए शंकरवर्मन् ने एक ब्राह्मण जिसका नाम ’नायक’ था, को नियुक्त किया था । सम्भवतः नायक का पूरा नाम भट्टनायक था जिनका नाम भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में बडे आदर से लिया जाता है । भट्टनायक ने “हृदयदर्पण” नाम का एक ग्रन्थ लिखा था जो अब उपलब्ध नहीं है । भट्टनायक, आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्ववर्ती थे । अभिनवगुप्त अपने सिद्धान्तों के पल्लवन में भट्टनायक से बहुत कुछ लिया है ।

शंकरगौरीश मन्दिर अपने आयाम में सुगन्धेश मन्दिर से बडा है । इस मन्दिर का मुखद्वार पूर्व दिशा में है । मुखद्वार से होते हुए हम इसके केन्द्रीय कक्ष (जिसे गर्भगृह भी कहते हैं) में पहुँचते हैं। गर्भगृह में प्रधान देवता के स्थान पर आज तीन पक्तिंयों में व्यवस्थित 9 वृत्ताकार छेद हैं जो स्पष्ट रूप से मुख्य देवता के पीठ को द्योतित करता हैं । इसी पीठ पर एक समय विशाल शिवलिंग था जो आज अनुपलब्ध है । यह मन्दिर देखने में बडा भव्य है । इस मन्दिर का बहुत बडा भाग अभी भी भूमिगत है जो उत्खनन के बाद ही सामने आ पायेगा ।

  • सुगन्धेश मन्दिर, पत्तन (वराहमूल)

सुगन्धेश मन्दिर अपने आयाम में शंकरगौरीश मन्दिर से छोटा है । मुखद्वार से होते हुए हम इसके केन्द्रीय कक्ष (जिसे गर्भगृह भी कहते हैं) में पहुँचते हैं । गर्भगृह में किसी समय एक विशाल शिवलिंग था, जो आज अनुपलब्ध है । केन्द्रीय कक्ष वर्गाकार है जिसका क्षेत्रफल 12’7” है । प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् कनिंगघम का मानना है कि गर्भगृह में तीन पीठ थे जो अब मन्दिर के प्रांगण में ही स्थित मस्जिद में देखे जा सकते हैं ।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शंकरगौरीश एवं सुगन्धेश मन्दिर भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक हैं। प्राकृतिक आपदाओं एवं मुस्लिम शासकों द्वारा नष्ट करने की कोशिश के बावजूद, अपने अवशेषों के द्वारा अपनी विराट महत्ता को आज भी द्योतित कर रहे हैं ।

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