संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के लिए आज तक कौन-कौन से प्रयास किए गए है?

22 Jan 2018 13:31:07

संवाद भाग – 5

 


 

मुकेश कुमार सिंह

प्रश्न - संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के लिए आज तक कौन-कौन से प्रयास किए गए है?

 

उत्तर - अनुच्छेद 370 से जुड़े घटनाक्रम का अध्ययन करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि आज तक अनुच्छेद 370 का तथ्यपरक विश्लेषण ही नहीं हुआ है जिसकी बहुत ज्यादा जरूरत है। यह संविधान का एकमात्र ऐसा प्रावधान है जो अपने समाप्त होने की प्रक्रिया स्वयं घोषित करता है, लेकिन देश में फिर भी संशय का माहौल बरकरार है। देश में बयानबाजी तो बहुत हुई पर अध्ययन नहीं हुआ। 

1964 तक देश में 370 को लेकर कोई संशय नहीं था। लोकसभा में 1964 की एक चर्चा है जिसमें लगभग सभी दल एकमत थे कि अनुच्छेद 370 का हटाया जाना बहुत जरूरी है। इस चर्चा में जम्मू कश्मीर के सांसदों ने भी हिस्सा लिया और अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए कहा कि आजादी के बाद पूरे देश में विकास और प्रगति की जो बयार बह रही है वह जम्मू कश्मीर में नहीं पहुंच पा रही है क्योंकि वहां पर अनुच्छेद 370 नाम की एक दीवार है जो विकास की इस बयार को बहने से रोक रही है। राम मनोहर लोहिया, सरजू पाण्डेय और भगवती झा जैसे वरिष्ठ व्यक्तियों ने 370 को खत्म करने का समर्थन किया। लेकिन हम चूक गए। अनुच्छेद 370 पर चर्चा के दौरान सभी दलों के सांसदों ने 370 को हटाने की बात कही। किन्तु तत्कालीन गृहमंत्री जी. एल. नन्दा ने अपने भाषण में कहा कि हम संसद की भावनाओं का सम्मान करते है, किन्तु 370 को हटाने का प्रस्ताव प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में आया है। कुछ समय रुकिये, सरकार खुद ही ऐसा बिल लेकर आयेगी और 370 समाप्त हो जायेगी। और उन्होंने व्हिप जारी कर दिया परिणामस्वरूप कांग्रेस ने बिल के विरुद्ध मत दिया जिससे बिल गिर गया। उसके बाद अनुच्छेद 370 हिन्दू-मुसलमान, भाजपा–गैर भाजपा आदि के ऐसे दलदल में फंस गया कि इसका उस दलदल से बाहर आना बहुत मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ समय से देश इस विषय पर दो खेमे बंट गया है। एक वह खेमा जो अनुच्छेद 370 को देश की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा मानता है और इसे हटाना चाहता है और दूसरा वह जो अनुच्छेद 370 को संविधान का विशेष दर्जा बताता है और इसे बचाएं रखना चाहता है।

अनुच्छेद 370 को रहना है या जाना है इसके लिए सबसे पहले एक निरपेक्ष अध्ययन होना चाहिए। जिसमें यह विश्लेषण किया जाए कि पिछले 67 वर्षो में जम्मू कश्मीर के लोगों को 370 की वजह से क्या-क्या लाभ एवं नुकसान हुए है। जम्मू कश्मीर में रहने वाली महिलाएं, ओबीसी, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति और राज्य की माइनारिटी को 370 से क्या मिला। जम्मू कश्मीर में पंचायती राज एक्ट क्यों लागू नहीं हो सका, इसका ग्राम स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा है। पूरे देश में जब जनजातीय समाज के लिए चुनावों में आरक्षण की व्यवस्था है तो जम्मू कश्मीर में क्यों लागू नहीं हुआ। जबकि जम्मू कश्मीर में 14 से 16 प्रतिशत जनजातीय समाज के लोग रहते है। इस बात पर चर्चा करने की जरूरत है जब एक सफाई कर्मचारी का बेटा पढ़ लिख कर आईएएस बन सकता है लेकिन जम्मू कश्मीर में रहने वाला सफाई कर्मचारी का बेटा जम्मू कश्मीर में चपरासी भी नहीं बन सकता। जो शिक्षा का अधिकार पूरे देश के बच्चों के लिए हितकर है वह जम्मू कश्मीर में हानिकारक कैसे हो सकता है। जब इन प्रश्नों का उत्तर खोजा जायेगा तो समझ में आयेगा कि अनुच्छेद 370 देश और समाज के साथ एक धोखाधड़ी है। जिसने भारत के लोकतन्त्र के साथ-साथ देश और राज्य के संस्थानों को कमजोर किया है। जिसके लिए देशभर के प्रबुद्ध लोगों में जागृति लाने की जरूरत है ताकि अनुच्छेद 370 के विषय में उठी धुंध हटाई जा सके और 370 को हटाने का रास्ता खुले।   

 

प्रश्न - आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर पूरी दुनिया का दबाव पड़ने लगा है, लेकिन कश्मीर समस्या में अब चीन भी आ गया है। इस कारण कश्मीर समस्या का समीकरण बदल रहा है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को क्या नई नीति अपनानी चाहिए?

 

उत्तर - हमको यह समझना चाहिए कि आज 1947 वाले हालात नहीं है। आज 2017 का समय भारत का है। आज जम्मू कश्मीर को लेकर दिशा और चर्चा भारत को अपने हिसाब से खड़ी करने की जरूरत है। यह हो सकता है कि 1947 में जम्मू कश्मीर पाकिस्तान के पास जाये ऐसा अंग्रेजों की साजिश रही हो, और उसका हम शिकार भी हो गये। किन्तु आज विश्व के घटनाक्रम और समीकरणों को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी नीति निर्मित करनी चाहिए जिसमें पाक अधिक्रांत और चीन अधिक्रांत जम्मू कश्मीर पर विशेष ध्यान केन्द्रित होना चाहिए।

आज पूरी दुनिया का परिदृश्य बदल रहा है। अभी चीन को लेकर वैश्विक स्तर पर आशंका है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि 1963, 64, 65 में पाकिस्तान ने भारत के ऊपर दबाव बनाने के लिए रूस का इस्तेमाल किया था। पाक ने रूस से कहा था कि वो भारत के जीते हुए क्षेत्र को उसको वापिस दिला दें। पाकिस्तान ने रूस को लालच भी दिया कि वह उसको गिलगित क्षेत्र में आने देगा। लेकिन भारत उस समय भी रूस के दबाव में नहीं आया और पाकिस्तान का षड्यंत्र फेल हो गया। लेकिन आज के बदले हुए परिदृश्य में सारी दुनिया का ध्यान गिलगित और चीन के ऊपर है। चीन किसी भी तरह हिन्द महासागर तक पहुंचना चाहता है। चीन का एक्सपेंशन इंडो-ओसियन तक रोकना है तो सीपीईसी बनना नहीं चाहिए और इसलिए वर्तमान समय में वेस्ट और यूएस सब जगह सोच यह है कि All Jammu Kashmir, Including Gilgit Baltistan must come to India. यह वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर को लेकर वैश्विक परिदृश्य की बात है। इसका देश को भरपूर लाभ उठाना चाहिए। पूरे पाक अधिक्रांत और विशेषकर गिलगित बल्तिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों का विषय पूरे विश्व में जोर-शोर से उठाना चाहिए। गिलगित बल्तिस्तान में बलती और शीन को किस तरह पाक सेना वहां की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को नुकसान पहुंचा रहे है, यह पूरा विषय उठाने की जरूरत है। इसके लिए वैश्विक स्तर के साथ देश के अंदर भी एक सूचनायुक्त विचार निर्मित करने की जरूरत है ताकि विषय को और अधिक मजबूती के साथ रखा जा सके।

 

प्रश्न - जम्मू कश्मीर राज्य की वर्तमान स्थिति के अपराधी कौन है और ऐसा किस कारण से है?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर राज्य की वर्तमान स्थिति को हम दो भागों में बांट सकते है। आंतरिक एवं बाह्य। जम्मू कश्मीर ने भारत पर होने वाले सभी बाह्य आक्रमणों को सबसे पहले और सबसे ज्यादा झेला है। यदि हम प्राचीन इतिहास की बात करे तो मुगल, पठान सभी के आक्रमणों का दंश जम्मू कश्मीर ने झेला है। यह सिलसिला 1947 के बाद भी जारी है। स्वतंत्रता के ठीक बाद पाकिस्तानी फौजों ने जम्मू कश्मीर पर पहला हथियार बंद हमला किया था। तब से लेकर आज तक पाकिस्तान चार बार सीधा हमला कर चुका है। 1947 के आक्रमण की वजह से हमारा बहुत बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया। 1962 में हमारा दूसरा पड़ोसी देश चीन जिसे हम अपना मित्र मान रहे थे भारत पर हमला किया और हमारा बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र आक्साईचीन अपने कब्जे में ले लिया। इस तरह कुल मिलाकर स्वतंत्रता प्राप्ति के 15 वर्ष के भीतर हमने जम्मू कश्मीर के अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र बाह्य ताकतों की वजह से खो दिया। इसके अतिरिक्त जम्मू कश्मीर के संदर्भ में विदेशी ताकतों का देश पर समय-समय पर प्रभाव पड़ता रहा है।

दूसरा भारत के अंदर भी ऐसे तत्व मौजूद थे जिनकी वजह से जम्मू कश्मीर ने कष्टदायक सफर तय किया था। जब-जब जम्मू कश्मीर के तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा था और एक झूठा दृष्टिकोण खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसे समय में भारत के बौद्धिक वर्ग की भूमिका बनती थी कि यह लोगों को सही रास्ता दिखाएं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बौद्धिक वर्ग भी उसी रास्ते पर चल निकला। उदाहरण के लिए हमने गिलगित बल्तिस्तान को पाकिस्तान के हाथों खो दिया। यह हमारे राजनैतिक नेतृत्व की असफलता हो सकती है, किन्तु बौद्धिक वर्ग की भी ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसने जम्मू कश्मीर के इतिहास, भूगोल और संस्कृति की सही जानकारी देश और समाज के सामने नहीं रखी। विदेशी षड्यंत्र, देश का कमजोर शीर्ष नेतृत्व, बौद्धिक दिवालियापन के साथ जम्मू कश्मीर की सबसे बड़ी चुनौती वहां पर निरंतर बढ़ रहा इस्लामिक कट्टरवाद है जो विशेषकर नवयुवकों को निशाना बनाकर आतंकी गतिविधियों के लिए भड़का रहा है।

 

प्रश्न - भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में जम्मू कश्मीर राज्य का क्या महत्व है?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर देश की सबसे बड़ी रियासतों में से एक थी। इसका कुल क्षेत्रफल 2,22,000 वर्ग किमी था। जिसमें से केवल 1,00000 वर्ग किमी ही आज के समय में हमारे पास है। महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित अधिमिलन में जो क्षेत्र सम्मिलित है उनमें पाक अधिक्रांत मीरपुर, भींबर, कोटली, गिलगित और बल्तिस्तान पाकिस्तान के कब्जे में चला गया है। भौगोलिक रूप से व्याख्या की जाए तो सम्पूर्ण क्षेत्रफल में से 59,000 वर्ग किमी का क्षेत्र लद्दाख में पड़ता है। इसके पूरे क्षेत्र में 5 घाटियां है जैसे नुबरा, जांस्कर, सुरू, बटालिक, चांगथांग। लद्दाख का कारगिल जिला सांस्कृतिक रूप से भी बहुत संपन्न माना जाता है। कारगिल पूरे देश का एकमात्र ऐसा जिला है कि जहां 6 भाषाएं बोली जाती है। ये भाषाएं है बलती, शिना, पुरीग, बुद्धिस्ट या भोटी, कश्मीरी और आर्यन भाषा। दूसरी ओर लेह जिलें में मुख्यत भोटी भाषा ही बोली जाती है।

राज्य का दूसरा बड़ा क्षेत्र जम्मू है। जम्मू में 10 जिले है। वैसे जम्मू का कुल क्षेत्रफल 36,000 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें से आज भी 1,0000 वर्ग किमी का क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में है। मुख्य रूप से जम्मू में डोगरी, गोजरी और पहाड़ी भाषा बोली जाती है।

राज्य का सबसे छोटा क्षेत्र कश्मीर है। इसका क्षेत्रफल 22,000 वर्ग किमी है जिसमें से आज 6,000 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान की अवैध कब्जे में है। यहां पर कश्मीरी, गुज्जर, पहाड़ी और शिना लोग रहते है।

 

प्रश्न - कश्मीर घाटी से विस्थापित हिन्दू के मानवाधिकार संरक्षण को लेकर मानवाधिकारवादी आवाज क्यों नहीं उठाते?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर में 1989 में जो कश्मीरी हिन्दू का निष्कासन हुआ वह बहुत पीड़ादायक प्रसंग था। लेकिन उससे भी ज्यादा पीड़ादायक और असंवेदनशील देश के कथित मानवाधिकारवादियों का व्यवहार रहा था। वर्तमान में भी देश में जिस तरह का वैचारिक विमर्श चल रहा है उसमें यदि देश में कही हिन्दू का विस्थापन होता है तो यह कोई प्रश्न नहीं है किन्तु यदि एक अखलाक जैसी घटना होती है तो देश के कथित मानवाधिकारवादी और मीडिया पूरे देश को सिर पर उठा लेते है। देश में टोलरेंस और इनटोलरेंस पर एक बहस छेड़ दी जाती है। कश्मीर के हिन्दुओं के विषय को किसी भी प्रकार की राजनीति से दूर रखकर मानवीयता के साथ विचार कर इसका निराकरण होना चाहिए।

 

 

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