दिल्ली में राष्ट्रवादी - जम्मू में सेक्युलर - कश्मीर में सांप्रदायिक : शेख अब्दुल्ला

29 Jan 2018 16:11:48

प्रश्नोत्तरी भाग – 9

 

 

 

प्रश्न: जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को गलत तरीके से प्रस्तुत करने और इसके कारण ठीक नीतियां न बन पाने का क्या कारण है?

 

उत्तर: पिछले 65 वर्षों से भारत जम्मू-कश्मीर की समस्या को केवल कश्मीर घाटी के नजरिए से देखता रहा है और यह अब भी जारी है। जबकि कश्मीर घाटी वर्तमान राज्य का मात्र 15 प्रतिशत है और संपूर्ण जम्मू-कश्मीर रियासत का मात्र 7 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार शेख अब्दुल्ला और उनके परिवार को ही राज्य के लोगों का एक मात्र प्रतिनिधि मानती है। यह भी एक बड़ी गलती है। शेख कभी भी जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के नेता नहीं रहे हैं लेकिन भारत सरकार आज तक इस बात को नहीं समझती।

 

प्रश्न: महाराज हरि सिंह के जम्मू-कश्मीर के परित्याग के बारे में बताएं?

 

उत्तर: यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हुआ। शेख अब्दुल्ला ने प्रधानमंत्री नेहरु के आशीर्वाद से महाराज हरि सिंह को अपमानपूर्वक जम्मू-कश्मीर छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। यहां तक कि सरदार वल्लभभाई पटेल भी इस निर्णय में सहभागी बने। शेख अब्दुल्ला स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर का सुल्तान बनने की महत्वाकांक्षा रखते थे लेकिन जब तक महाराज वहां पर थे उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती थी। और इसीलए राज्य के विधिक शासक को राज्य का परित्याग करने के लिए विवश किया गया।

 

 

प्रश्न: विभाजन के समय अंग्रेजों की जम्मू-काश्मीर के बारे में क्या सोच थी?

 

उत्तर: विभाजन के समय जम्मू- कश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाने की ब्रिटेन ने गुप्त योजना बनाई थी। उनकी योजना साम्यवादी रुस और चीन को भू-रणनीतिक रुप से रोकने की थी। इस दृष्टि से पाकिस्तान को वे रणनीतिक भागीदार के रूप में देखते थे। सशक्त स्थिर पाकिस्तान उनकी आवश्यकता थी। जम्मू-कश्मीर रियासत मध्य एशिया तक पहुंच के लिये भारत की दृष्टि से द्वार है। पहले उन्होंने इसके पाकिस्तान में विलय का प्रयास किया लेकिन जब वह इसमें विफल रहे तो उन्होंने अगले कदम के रुप में जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की कोशिश की।

 

प्रश्न: शेख अब्दुल्ला संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अमेरिका के लेक सक्सेस क्यों भेजे गए?

 

उत्तर: यह एक गलत निर्णय था। उन्हें जम्मू-कश्मीर का वैधानिक दृष्टि से प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं था। प्रतिनिधित्व का वास्तविक अधिकार महाराजा हरि सिंह के पास था। फिर भी भारतीय प्रधानमंत्री के मनमानीपूर्ण सनकी व्यवहार के कारण उन्हें भारत सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया। वास्तव में नेहरु महाराजा से घृणा करते थे वहीं शेख अब्दुल्ला पर वे आंख मूंद कर भरोसा करते थे।

 

प्रश्न: शेख अब्दुल्ला के मन में जम्मू-कश्मीर की स्वतंत्रता का विचार कहां से आया?

 

उत्तर: संभवतः उनके मन में यह विचार अमेरिका द्वारा लेक सक्सेस के प्रवास के दौरान रोपा गया। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर रियासत एक बहुत बड़ा राज्य था। इसका क्षेत्रफल 2 लाख 22 हजार वर्ग किमी था और यह पांच देशों की सीमाओं को स्पर्श करता था। यदि जम्मू-कश्मीर स्वतंत्र रुप से अस्तित्व में आ पाता तो यह कई यूरोपीय देशों से बड़ा होता। इसीलिए शेख के मन में औपनिवेशिक शक्तियों के आशीर्वाद से स्वतंत्र सुल्तान बनने का विचार आया।

 

 

प्रश्न: यदि शेख अब्दुल्ला जम्मू और लद्दाख के नेता नहीं थे तो 1950-51 में हुए पहले चुनाव में उनकी जीत कैसे हुई ?

 

उत्तर: उन्होंने कपटपूर्ण तरीके से अधिकांश विरोधी प्रत्याशियों के नामांकन को निरस्त करा दिया। इसके कारण स्वाभाविक रुप से विधानसभा के सभी सदस्य उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के बने। इन 75 सदस्यों में से 73 लोग निर्विरोध चुनकर आए थे।

 

प्रश्न: क्या इस प्रकरण पर केन्द्र सरकार द्वारा संज्ञान लिया गया। क्या इसे ठीक करने के कोई प्रयास हुए?

 

उत्तरः संघीय सरकार द्वारा इस पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आयी। चुनाव की आड़ में हुई इस धोखाधड़ी पर केन्द्र ने आंख मूंद ली।

 

 

प्रश्नः केन्द्र की इस चुप्पी के पीछे क्या कारण था?

 

उत्तरः केन्द्र द्वारा इसका कभी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया इसलिए अधिकृत कारण बता सकना कठिन है। संभवतः भारतीय संविधान को राज्य में लागू करने और राज्य की जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में शेख की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए सुरक्षा परिषद के जाल से निकलने तक केन्द्र सरकार ने इस पर मौन साधने की रणनीति अपनायी हो।

 

प्रश्नः क्या इस रणनीति का सकारात्मक परिणाम निकल सका?

उत्तर: नहीं। अपितु अलगाव की ओर एक कदम आगे बढ़ते हुए शेख अब्दुल्ला ने  पं. नेहरु को कहा कि जम्मू-कश्मीर के विलय पत्र में उल्लिखित संघीय संविधान के केवल 3 विषयों को ही राज्य में लागू करना चाहते हैं। वह राज्य के लिए एक अलग ध्वज चाहते थे, वह कोई चुनाव आयोग नहीं चाहते, कोई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक नहीं चाहते थे,  कोई भारतीय प्रशासकीय सेवा नहीं चाहते थे, कोई संसदीय चुनाव नहीं चाहते थे और यहां तक कि वह यह भी नहीं चाहते थे कि शेष राज्यों की तरह राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल नियुक्त करे।

 

प्रश्न: शेख अब्दुल्ला की चुनौतीपूर्ण मांगों पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की क्या प्रतिक्रिया रही?

 

उत्तर: अब उन्हें यह महसूस हुआ कि उनके साथ विश्वासघात हुआ है। अनुच्छेद 370 के कारण संघीय संविधान को राज्य में लागू करने के लिये निर्मित राज्य की संविधान सभा पर धोखाधड़ी के द्वारा शेख अब्दुल्ला ने कब्जा कर लिया। पं. नेहरू अब हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए थे।

 

प्रश्न: क्या सरदार पटेल भी शेख पर इतना ही भरोसा करते थे?

 

उत्तर: नहीं। पटेल ने नेहरु को इसके लिये समय रहते अनेक बार चेताया भी था किन्तु पं. नेहरू ने उसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। दुर्भाग्य से, शेख अब्दुल्ला ने जब जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में गैरकानूनी मांगे उठानी शुरु की,  उन्हीं दिनों सरदार पटेल की मृत्यु हो गई।

 

प्रश्न: पं. नेहरु को दिल्ली समझौता क्यों करना पड़ा?

 

उत्तर: नेहरु शेख के दबाव में आ गए और अंततः उसकी मांगों को मान लिया। जवाहरलाल नेहरु और शेख ने 1952 में एक समझौता किया। नेहरु ने इसी आधार पर भारतीय संसद में जम्मू-कश्मीर पर एक समझौता होने की बात कही। वास्तविकता यह है कि यह समझौता नहीं बल्कि दो राजनैतिक व्यक्तियों के बीच की सहमति थी। नेहरु और शेख के पास इस तरह का समझौता करने का अधिकार नहीं था। दोनों ही के पास समझौता करने की विधिक सत्ता नहीं थी। वे इसके लिए प्राधिकृत नहीं थे। यह कोई हस्ताक्षरित दस्तावेज भी नहीं है। अनेक कारणों से इसका कोई वैधानिक महत्व भी नहीं है।

 

प्रश्न: नेहरु-शेख समझौते के अंतर्गत किन बिंदुओं पर सहमति बनी थी?

 

उत्तर: अन्य भारतीय राज्यों के विपरीत जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा स्वविवेक से नहीं अपितु विधानसभा द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही की जायेगी। मुख्यमंत्री और राज्यपाल की शब्दावली का उपयोग जम्मू-कश्मीर में नहीं किया जाएगा। इसकी जगह वजीर-ए-आजम और सदर-ए-रियासत शब्द का उपयोग किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा होगा। जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान होगा और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को जम्मू-कश्मीर के मामलों पर निर्णय करने का अधिकार नहीं होगा। चुनाव आयोग का कार्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर में नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर में भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नहीं नियुक्त होगें। इसी तरह की अन्य बातों के कारण भारतीय संविधान के प्रावधानों का राज्य में मजाक बन गया। यह सब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु की अविवेकपूर्ण घातक तुष्टीकरण की नीति के कारण हुआ।

 

प्रश्न: 1952 के शेख-नेहरु समझौते के बाद जम्मू-कश्मीर और शेष भारत में क्या प्रतिक्रिया हुई?

 

उत्तर: भारत और जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रभक्त लोगों ने नेहरु द्वारा शेख के सामने चुपचाप समर्पण किए जाने को स्वीकार नहीं किया। इसके खिलाफ जम्मू-कश्मीर में प्रजा परिषद आंदोलन हुआ। 17 नवंबर 1952 से पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में जम्मू में इस आंदोलन के प्रथम चरण की शुरुआत हुई। प्रारंभ में वह जम्मू-कश्मीर प्रांत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक थे और उस समय राज्य के मुख्य विपक्षी दल प्रजा परिषद के अध्यक्ष थे। इस आंदोलन का नारा था कि एक देश में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नहीं चलेंगे।

  

प्रश्न: प्रजा परिषद आंदोलन के दौरान क्या घटित हुआ?

 

उत्तर: आंदोलन को जबरन कुचलने के राज्य सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के कारण 15 लोग शहीद हो गए। 5 हजार से अधिक लोगों को जेल में ठूंस दिया गया। डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी आंदोलन में भागीदार होने के लिए आए और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। राज्य भर में इस समझौते के विरोध में लोगों ने गले में डा. राजेंद्र प्रसाद का चित्र, एक हाथ में भारतीय संविधान की प्रति और दूसरे हाथ में भारतीय तिरंगे को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। अंततः नेहरु जी को लोगों की इच्छाओं के समक्ष झुकना पडा।

 

 

 

 

 

[यह उद्धरण जम्मू कश्मीर पर लिखी पुस्तक "जम्मू कश्मीर: समस्याओं का मिथक" में से लिया गया है, पुस्तक के लेखक हैं श्री आशुतोष भटनागर, जिनका जम्मू कश्मीर विषय पर गहन अद्धयन है I पुस्तक के बाकी अंश भी आने वाली  लेख श्रंखला में प्रकाशित किये जाएंगे]

 

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