यह भी हैं वंचित और शोषित! 

29 Jan 2018 16:44:24

 

 

 Chandan Anand

देश-विदेश में आज सबसे ज्यादा चिंता अगर किसी को लेकर हो रही है तो वह वंचित और शोषितों को बराबरी के अधिकार दिलाने की और संपूर्ण जनमानस के मानवाधिकारों की। आए दिन हम देखतें हैं कि किस तरह राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, गैर सरकारी संस्थाएं, मानवाधिकार कार्यकर्ता, समाजसेवी, समाचार-पत्र और न्यूज चैनल वंचित एवं शोषितों के अघिकारों के लिए लड़ते दिखते हैं। लड़ाई हर कोई किसी न किसी को मानवाधिकार, बराबरी या समाजिक न्याय दिलाने के लिए लड़ रहा है। वंचितों की इस लड़ाई को लड़ने वालों के भी अलग-अलग वर्ग है। 

अनेक संगठन एवमं व्यक्ति महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए दिन-रात संघर्षरत है, कोई अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ी जाति अथवा जनजाति के लिए संघर्षरत है अथवा कोई मानवाधिकारों की चिंता में दिन-रात व्यवस्था को कोस रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सभी वर्ग वास्तव में समाज में समानता और अधिकारों के लिए संघर्षरत है। पर संदेह की नजरें उठती है तो उन सबके उपर जो इन सबके लिए लड़ने का ढ़ोंग करते हैं। यह सभी मानवाधिकारी एक स्थान या विशेष वर्ग पर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न को तो देखतें हैं, पर वहीं किसी अन्य स्थान या वर्ग पर हो रहे अत्याचारों पर अपनी आंख मूंद लेते हैं। 

6 दिसम्बर 2018 को भारत रत्न बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर के 61वें महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर पूरे देश ने उन्हे भावपूर्ण श्रद्धांजली दी। देश में इन सभी वंचित एवं शोषित वर्गों को समानता दिलाने के लिए जो योगदान बाबा साहब अम्बेडकर का रहा वह शायद ही किसी का रहा होगा। विश्व इतिहास में हमें बिरला ही कोई ऐसा उदाहरण मिलता है जहां बिना किसी खून-खराबे या गृहयुद्ध के समाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ी गई हो। 

भारत में समाजिक परिवर्तन की इतनी बड़ी लड़ाई बिना देश या समाज को तोड़े या बिना किसी गृहयुद्ध के लड़ी गई तो इसका पूर्ण श्रेय बाबा साहब अम्बेडकर के विवेकपूर्ण संघर्ष को जाता है। एक ऐसा संघर्ष जो समाज पर गहरे और गंभीर कटाक्ष तो कर रहा था, पर उसे टूटने नहीं दे रहा था। समाज को झकझोर तो रहा था, उसमें सुधार तो चाहता था, पर विद्रोह या बदला नहीं। इसी विवेकपूर्ण बुद्धि से बाबा साहब अम्बेडकर ने इन सभी वंचित एवं शोषित वर्गो के हितों एवं अधिकारों की गारंटी देने वाला संविधान भारत को दिया।

बाबा साहब अम्बेडकर ने जहां वंचित एवं शोषित वर्गो को समानता और समाज में साम्यता की बात की, वहीं महिलाओं को समान अधिकारों के लिए भी वह संघर्षरत रहे। भारत के विधि मंत्री रहते हुए उन्होंने पैतृक संपत्ति पर महिलाओं के बराबर अधिकार के लिए संसद में बिल भी पेश किया, जोकि पास नहीं हो सका। आज बाबा साहब अम्बेडकर के प्रत्येक महापरिनिर्वाण दिवस पर भी पूरे देश ने उनको श्रद्धांजली तो दी जाती है, उनके नाम पर आज भी कई लोग एवं संगठन वंचितों एवं शोषितों के मानवाधिकारों की बात तो करते हैं, पर न जाने क्यों भारत का शीर्ष कहे जाने वाले राज्य जम्मू-कश्मीर में रह रहे लाखों वंचित और शोषित लोगों और महिलाओं पर किसी का ध्यान नहीं जाता? क्यों सभी अम्बेडकरवादी और मानवाधिकारों के नाम पर छाती पीटने वाले लोग जम्मू-कश्मीर में रह रही महिलाओं की समानता और वंचित जातियों के अधिकारों की बात नहीं करते? बाबा साहब अम्बेडकर ने तो पूरे देश में रह रहे वंचित एवं शोषित वर्ग को समानता दिलाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। तो उनके तथाकथित अनुयायी क्यों वास्तविक वंचितों और शोषितों से अपनी आंखे मूंद लेते है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35ए की वजह से जम्मू-कश्मीर राज्य में रह रहे वंचित एवं शोषित वर्ग स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी अपने मूल अधिकारों एवं समानता के लिए संघर्षरत हैं। इन शोषित वर्गो में वो सब वर्ग आते है जिनके अधिकारों के लिए हर कोई लड़ने का दावा करता है। भारतीय संविधान में दी गई अनुसूचित जातियां, अन्य पिछड़ी जातियां एवं महिलाएं अगर वास्तव में कहीं समानता और अधिकारों के लिए लड़ रही है तो वह जम्मू-कश्मीर राज्य है। और सामाजिक न्याय और असमानता का कारण है तो वह है अनुच्छेद 35ए। 1954 के राष्ट्रपति आदेश द्वारा बिना संसदीय कार्यवाही के भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35ए जोड़ दिया गया। जिसकी संवैधानिक वैधता को लेकर बहस चल रही है। इस अनुच्छेद द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य की विधानसभा को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह राज्य के स्थायी निवासी निश्चित कर उनके लिए विशेष प्रावधान कर सकती है। साथ ही इन प्रावधानों से भारत अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं माना जाएगा।

राष्ट्रपति के आदेश द्वारा लाए अनुच्छेद 35ए ने भारत के अन्य हिस्सों के लोगों के लिए तो जम्मू-कश्मीर के सारे रास्ते तो बन्द कर दिए, लेकिल लाखों की तादात में जम्मू-कश्मीर में रह रहे शरणार्थियों, महिलाओं एवं सरकार के विशेष आग्रह पर पंजाब से आए वाल्मीकि  समाज के लोगों को अपने ही देश में अमानवीय जीवन जीने को विवश कर दिया।

ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय जो लोग पश्चिमी पाकिस्तान से भारत की ओर आए, उनमें से कुछ अभागे लोग भविष्य में आने वाले विभाजन से भी भयावह संकटों से अनभिज्ञ जम्मू-कश्मीर राज्य के जम्मू संभाग में आ गए। यह लोग वह थे जो पाकिस्तान के सियालकोट से जम्मू आए थे क्योंकि सियालकोट से जम्मू के सुचेतगढ़ बार्डर की दूरी मात्र 11 कि.मी. थी। उस समय यह कुल 5764 हिन्दू और सिख परिवार थे जिनकी संख्या 47215 थी। शरणार्थियों के रूप में आए इन लोगों की संख्या आज ढ़ाई लाख हो गई है। इन शरणार्थियों में लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या उन लोगों की है जो भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जातियां या अन्य पिछड़ी जातियां हैं। 

स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी इन लोगों को पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी कहा जाता है। यह लोग 70 वर्ष पहले जिन जगहों पर बसाए गए थे, आज भी वहीं हैं। यह दो लाख के करीब अनुसूचित जाति के लोग जम्मू-कश्मीर राज्य में संपत्ति नहीं खरीद सकते, वहां पर कोई पंजीकृत व्यापार नहीं कर सकते, इनके बच्चे प्रदेश सरकार द्वारा संचालित व्यवसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश नहीं ले सकते, छात्रवृत्ति नहीं प्राप्त कर सकते, सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकते, राज्य सरकार में कोई नौकरी नहीं कर सकते, विधानसभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वोट नहीं दे सकते, अनुसूचित जाति वर्ग से है पर आरक्षण समेत कोई लाभ नहीं ले सकते और अंत में प्रदेश में सैटल भी नहीं हो सकते।

पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के अलावा 1957 में जम्मू-कश्मीर में पंजाब के होशियारपुर से आए वाल्मीकि समाज के लोग भी आज राज्य में ऐसा जीवन जीने को मजबूर हैं। 1957 में जम्मू-कश्मीर में स्थानीय सफाई कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने से पूरा राज्य गंदगी से भर गया था। उस समय सरकार ने विशेष आग्रह करके पंजाब से वाल्मीकि समाज के 296 लोगों को राज्य में बसाने और नौकरी देने के वायदे के साथ लाया। उन लोगों ने उस समय अपने कर्म को प्राथमिकता देकर राज्य की सफाई कर राज्य को गंदगी से बाहर निकाला। लेकिन सरकार की चाल में फंसे व भले मानस सरकार की मानसिक गंदगी को बाहर नहीं निकाल सके। आज पूरे 70 वर्ष हो गए उन लोगों को राज्य में रहते हुए, तीन पीढ़ियां बीत गई। यह संख्या 296 से हजारों में हो गई, पर अपने ही देश में वे अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं।

पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों की तरह वह भी वहां सरकारी नौकरी, व्यवसाय, संपत्ति, व्यवसायिक शिक्षा, छात्रवृत्ति, सरकारी योजनाएं, अनुसूचित जाति के लाभ, आरक्षण, स्थानीय चुनावों में वोट जैसे सब अधिकारों से वंचित हैं। इन सब शोषण के अलावा एक अन्य अमानवीय षड़यंत्र जो उन लोगों के साथ राज्य की सरकार ने किया वह था उन्हे नौकरी देने का। राज्य सरकार के नियमों के अनुसार वह लोग राज्य में सरकारी नौकरी तो कर सकते हैं, पर केवल गटर-नाले साफ करने की। इस समाज को जिस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से निकालने के लिए बाबा साहब पूरे जीवन संघर्षरत रहे, जम्मू-कश्मीर राज्य में योजनाबद्ध तरीके से उन्हें उसी स्थिति में रहने को बाध्य कर दिया। परन्तु किसी भी तथाकथित अम्बेडकरवादी की नजर उन पर नहीं पहुंचती।

इन वंचित एवं शोषित वर्ग के लोगों को जम्मू-कश्मीर राज्य में अमानवीय यातनाएं इसीलिए झेलनी पड़ रही हैं क्योंकि वह राज्य के स्थाई निवासी नहीं है। स्थायी निवासी न होने की वजह से अनुच्छेद 35ए की मार इन अनुसूचित जाति एवं अन्य पिछड़ी जाति के लोगों को झेलनी पड़ रही है। जिस संविधान को बाबा साहब अम्बेडकर ने संपूर्ण समाज में समानता और सामयता पैदा करने के लिए बनाया, आज उसी संविधान के दुरुपयोग के कारण यह वर्ग अपने मौलिक अधिकारों से ही वंचित है।

इसी कड़ी में एक तीसरा वर्ग भी आता है, जिनको समान अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब अम्बेडकर हमेशा प्रयासरत रहे। चाहे वह प्रसव के दौरान और बाद में महिला कर्मचारियों को छुट्टी के प्रावधानों की बात हो या पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार की, इन सब बातों को अंग्रेजी शासनकाल के समय और बाद में रखने वाले पहले व्यक्ति बाबा साहब अम्बेडकर ही थे। आज यही महिला वर्ग, जम्मू-कश्मीर राज्य में समान अधिकारों से वंचित है। 2002 से पूर्व राज्य के नियमों के अनुसार यदि राज्य की कोई बेटी राज्य से बाहर विवाह करती थी तो राज्य के उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते थे। 2002 में राज्य उच्च न्यायालय के फैसले के चलते जम्मू कश्मीर से बाहर के लड़के से शादी के उपरांत महिला के अपने अधिकार तो सुरक्षित है किन्तु वह जब तक जीवित है तब तक ही कोई संपत्ति राज्य में रख सकती है। उसकी संपत्ति का अधिकार केवल उस तक ही रहेगा, वह न तो उसके पति को कभी मिल सकती है, न ही बच्चों कों। मरणोपरान्त उसकी संपत्ति राज्य की हो जाएगी। उनके बच्चें को वहां के शिक्षण सस्थाओं में शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते। राज्य सरकार में नौकरी नहीं कर सकते है। लोकतांत्रिक देश भारत में भी राज्य की महिलाओं को इस तानाशाही व्यवस्था को झेलना पड़ रहा है। राज्य में महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी, जम्मू-कश्मीर की महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है। 

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाल ही में हुए बाबा साहब आम्बेडकर के मरणोपरान्त महापरिनिर्वाण दिवस और विश्व मानवाधिकार दिवस पर किसी भी तथाकथित अम्बेडकरवादी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, संस्था, संगठन, राजनितिक दल, समाचार पत्र, महिला मोर्चा या संगठन, अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों का रोना रोने वाले पत्रकार अथवा सरकार द्वारा इन वास्तविक वंचित और शोषित लोगों के लिए एक शब्द भी नहीं कहा गया। न किसी तथाकथित अम्बेडकरवादी ने इन वंचितों और शोषितों की तरफ देखा, न किसी मानवाधिकारी को इनके मानवाधिकारों की चिन्ता हुई और न ही किसी को इन महिलाओं के समान अधिकार का ख्याल आया और भारत में बाबा साहब को श्रद्धांजली भी दे दी और विश्व मानवाधिकार दिवस भी मन गया।

 

 

 

 

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