जम्मू-कश्मीर - सुर्खिया, आज़ादी और लोकतंत्र

30 Jan 2018 18:51:50

 


 

देवेश खंडेलवाल

 

हम प्रतिदिन अखबार अथवा टेलीविजन के माध्यम से पढ़ते, देखते और सुनते है कि विश्व में क्या घटनाक्रम हो रहे हैं। सामान्यतः यह हमारे दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन चुका हैं। आजकल मोबाइल के माध्यम से भी हम जानकारियां हासिल कर रहे हैं। हम देखते है कि कोई भी एक खबर ज्यादा-से-ज्यादा एक दिन अथवा एक सप्ताह तक चर्चा का विषय बन पाती हैं। कुछ अति महत्वपूर्ण विषय इससे ज्यादा दिनों तक चर्चा का विषय बन सकते हैं। उनका जल्दी ही सरकार, न्यायपालिका और जनचेतना से समाधान हो जाता हैं। अगर ऐसा हो कि एक खबर जोकि 1947 से लेकर आजतक सुर्खियों में बनी हुई है, तो क्या हमें इस पर विचार नही करना चाहिए?

भारत की आज़ादी से लेकर आजतक हमने विभिन्न राजनैतिक संकटों को पढ़ा हैं। मेरा जन्म पिछली सदी में 90 के दशक के आखिरी साल में हुआ। उससे पहले और 20वीं सदी के अंत तक भाषाई प्रान्तों की सरंचना, पूर्व-उत्तर भारत में अलगाव और पंजाब में खालिस्तान जैसे प्रश्न खड़े हुए। उनकी व्याख्या इसलिए करने की जरूरत नही हैं क्योंकि यह सभी अब समाप्त हो चुके हैं। इसके अलावा नक्सल आतंकवाद भी वर्तमान में खत्म होने की कगार पर हैं। खास बात है कि यह सभी मुद्दें आजकल खबरों का हिस्सा नही बनते। आने वाली पीढ़ी इन्हें पुस्तकों के माध्यम से ही जान पाएगी।

अब बात करते है एक ऐसी समस्या की जोकि स्वतंत्रता के समय से ही ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनती आ रही हैं। आमतौर पर यह सभी जानते है कि जम्मू-कश्मीर धरती का स्वर्ग हैं। प्राचीन, वैदिक-पौराणिक और मध्य इतिहास कालखड़ों में यह सम्पूर्ण भारत के साथ सांस्कृतिक, बौद्धिक और राजनैतिक गठजोड़ का हिस्सा रहा हैं। महान हिमालय पर्वत श्रृंखला से घिरे इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। श्री वैष्णों देवी और श्री अमरनाथ यात्रा के लिए हममें से कोई कभी-न-कभी वहां जा चुके हैं अथवा जाने की तैयारी कर रहे हैं। वहां की केसर विश्व की सबसे बेहतरीन होती हैं। हाथों द्वारा बुनकर तैयार की गई शॉल का कोई मुकाबला नही हैं। इनके अलावा भी अनेक ऐसे तथ्य है जोकि जम्मू-कश्मीर को भारत का ताज कहलाने में सार्थक भूमिका निभाते हैं।

इस राज्य का देशभर के अन्य राज्यों के तरह ही प्रशासन हैं। दिल्ली सहित देश के अन्य शहरों से प्रतिदिन दर्जनों रेलगाड़ियां और हवाई उड़ाने जम्मू और श्रीनगर को जोड़ती हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग के द्वारा यहां से वाहन द्वारा कन्याकुमारी तक की यात्रा सुगम हो चुकी हैं। शैक्षिक और स्वास्थ्य सेवाओं में यह राज्य भारत के अन्य राज्यों के समान हैं। एम्स, एनआईटी, आईआईटी और आईआईएमसी सरीखे संस्थान यहां स्थित हैं। सबकुछ समान होते हुए भी यह राज्य सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करता रहा हैं और पिछले 7 दशकों से सुर्खियों में बना हुआ हैं। जबकि अन्य समस्याएं उत्पन्न हुई और उनका समाधान हो गया अथवा समाप्त हो गयी। गौर करने वाली बात है कि देश के सभी बड़े पुस्तकालयों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद किसी एक राज्य अथवा विषय पर सर्वाधिक पुस्तकें उपलब्ध है तो वह जम्मू-कश्मीर ही हैं। फिर भी यह प्रश्न बार-बार हमारे सामने आता हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि यह राज्य एक समाधान नही ढूंढ पा रहा हैं।

 


विचार पिछले 70 सालों से हो रहा हैं। आखिर कब तक होगा यह अब सोचना ही होगा। आज शेख अब्दुल्ला की तीसरी पीढ़ी वहां जन्म ले चुकी हैं। वहां दो ऐसे मुद्दे है जो आये दिन सुर्खियों में रहते हैं। पहला आज़ादी की मांग और दूसरा आतंकियों द्वारा इसकी मांग करना। वहां के कुछ युवा कहते है कि उन्हें आज़ादी चाहिए। व्यवहारिक तौर पर आजादी की एक सामान्य परिभाषा है प्रत्येक को कार्य का अधिकार, बोलने का अधिकार और विचार रखने का अधिकार मिले। इसके अलावा निर्वाचन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बसना जैसे अधिकार इसमें शामिल होते हैं।

इन सभी को आधार मानकर ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2016 में विश्व के सभी देशों में शासन के स्वरूपों की एक सूची जारी थी। उन्होंने बेहतर से बदतर व्यवस्था को श्रेणीबद्ध किया।   सर्वप्रथम लोकतांत्रिक देशों को स्थान मिला जिसमे नॉर्वे पहले स्थान पर है। भारत और उसके पड़ोसियों में मात्र हम ही है जिनकी स्थिति अन्य से बेहतर हैं। हमारा देश 32वें स्थान पर रखा गया। हमसे पहले के स्थानों पर अधिकतर यूरोप के राष्ट्र हैं। वह सभी क्षेत्रफल और जनसंख्या के आधार पर छोटे हैं। उनकी साक्षरता, स्वास्थ्य और शिक्षा की दरें अधिक हैं। भारत पहले 100 देशों में अकेला ऐसा देश है जिसकी जनसंख्या 100 करोड़ से ऊपर हैं। जबकि हमारा एक भी पड़ोसी इस सूची के पहले 100 देशों में शामिल तक नही हैं। बांग्लादेश का औसत थोड़ा बेहतर हैं। तो ऐसे में जो पक्ष यह कहता है कि उसे आज़ादी चाहिए उसे वास्तव में इसके मायने पता ही नही हैं। रही बात धर्म के नाम पर आज़ादी की तो उसे पाकिस्तान के रूप में देखा जा सकता हैं। आज वहां क्या विकराल स्थितियां है उसे दोहराने की आवश्यकता नही हैं।

दूसरा पहलू है कि जम्मू-कश्मीर में पिछले दिनों एक बड़ी संख्या में वहां आतंकवादियों को हमारे सुरक्षाबलों द्वारा मारा जा रहा है। इन आतंकियों को वहां का स्थानीय अलगावववाद हवा देता हैं। सम्पूर्ण विश्व में एकमात्र यह अजीब सा उदारहण है कि तथाकथित आज़ादी की मांग आतंकवादियों द्वारा की जा रही हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया में जितनी भी आतंकी गतिविधियां है वह उन्मांद से भरी हुई हैं। वे आज़ादी नहीं मागंते बल्कि पूरी शासन व्यवस्था पर जबरन कब्ज़ा करने के लिए लड़ रहे है और नागरिकों को गुलाम बना रहे है। क्या इस पर विचार करना क्या जरूरी नही है कि बंदूक देकर जम्मू-कश्मीर में युवाओं को किस प्रकार भटकाया जा रहा हैं। उनका उद्देश्य कश्मीर घाटी को इन देशों की तरह कट्टरता की आग में झोंक देना हैं।

एक तथ्य है कि कश्मीर घाटी के चार-पांच जिलों में यह समस्या व्याप्त हैं। सुरक्षाबलों की निगरानी वहां रहती हैं। उसका कारण वहां के जनजीवन को प्रभावित नही करना है बल्कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को विफल करना हैं। बाकी पूरा जम्मू-कश्मीर राज्य शांत और समृध्दि की ओर अग्रसर हैं। खबरें बनती है लेकिन उनका एक सकारात्मक पहलू भी सामने आना चाहिए। जिससे निकट भविष्य में जितनी भी समस्याएं वहां बची है वह समाधान पर पहुंच सके।

 

 

 

 

 

 

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