विस्मृति में जा रहा अमूल्य प्रतीक चिह्न शंकरपल

31 Jan 2018 19:11:58

 


डा. मयंक शेखर

श्रीनगर से 22 किलोमीटर की दूरी पर दाक्षीगाम नेशनल पार्क स्थित है। दाक्षीगाम नेशनल पार्क महादेव पर्वत की तलहटी में बसा है । इस पार्क में एक विशाल शिला है, जिसे शंकरपल के नाम से जाना जाता है। शंकरपल का कश्मीर शैवागम के इतिहास में एक महत्तपूर्ण स्थान है। इस शिला के विषय में आचार्य अभिनवगुप्तपाद के शिष्य क्षेमराज अपनी “शिवसूत्रविमर्शिनी” में विस्तार से बताते हैं।

इह कश्चित् शक्तिपातवशोन्मिषित् माहेश्वरभक्त्यतिशयात् अनङ्गीकृताधरदर्शनस्थ-नाग-बोध्यादि-सिद्धादेशनः शिवाराधनपरः पारमेश्वर-नानायोगिनी-सिद्धसत्सम्प्रदाय-पवित्रितहृदयः श्रीमहादेवगिरौ महामाहेश्वरः श्रीमान् वसुगुप्तनामा गुरुरभवत्।

कदाचिच्च असौ द्वैतदर्शनाधिवासितप्राये जीवलोके रहस्यसम्प्रदायो मा विच्छेदिइत्याशयतः अनुजिघृक्षापरेण परमशिवेन स्वप्ने अनुगृह्य उन्मिषितप्रतिभः कृतः यथा अत्र महति शिलातले रहस्यम् अस्ति तत् अधिगम्य अनुग्रहयोग्येषु प्रकाशयइति। प्रबुद्धश्च असौ अन्विष्यन् तां महतीं शिलां करस्पर्शनमात्रपरिवर्तनतः संवादीकृतस्वप्नां प्रत्यक्षीकृत्य, इमानि शिवोपनिषत्संग्रहरूपाणि शिवसूत्राणि ततः समाससाद। एतानि च सम्यक् अधिगम्य भट्टश्रीकल्लटाद्येषु सच्छिष्येषु प्रकाशितवान् स्पन्दकारिकाभिश्च संगृहीतवान्। क्षेमराज, शिवसूत्रविमर्शिनी

 

शैवागमों की परम्परा अति प्राचीन है। ये शिव प्रोक्त माने जाते हैं। किन्तु बीच में ये शैवागम लुप्तप्राय हो गये एवं इस बीच नागबोधि जैसे बौद्ध आचार्यों ने द्वैत-मूलक सिद्धान्तों की स्थापना करके सामान्य लोगों को दिग्भ्रमित कर दिया। ऐसी अवस्था में रह रहे लोगों को मुक्त करने की इच्छा से एवं द्वैतदर्शनों से अधिवासित होकर शैवागम लुप्त न हो जाएँ – इस आशय से स्वयं भगवान् शिव ने स्वप्न में वसुगुप्त नाम के एक सिद्ध आचार्य को दीक्षित किया एवं स्वप्न में ही वसुगुप्त को महादेव पर्वत की तलहटी में (वर्तमान का दाक्षीगाम) स्थित एक शिला पर उत्कीर्ण शिवसूत्र का पता एवं उन सूत्रों का रहस्य भी बताया। अगले दिन भगवान् शिव के द्वारा बताते गये स्थान अर्थात् महादेव पर्वत की तलहटी में स्थित उस शिला के पास वसुगुप्त पहुँचे। अपने हाथों के स्पर्श से वसुगुप्त ने उस शिला पर शिवसूत्र का दर्शन किया। वसुगुप्त ने इन शिवसूत्रों का संग्रह करके “शिवसूत्र” की रचना की। साथ ही साथ भट्टकल्लट जैसे शिष्यों को इसके रहस्यों को समझाया। भट्टकल्लट ने आगे चलकर “स्पन्दकारिका” की रचना की। आचार्य वसुगुप्त का “शिवसूत्र” एवं भट्टकल्लट का “स्पन्दकारिका” – को आधार बनाकर शैव आचार्यों ने विभिन्न ग्रन्थों की रचना की एवं समस्त विश्व को एक नई विचार-परम्परा से अवगत कराया जो मूलतः अद्वैतवादी है। इस प्रकार लुप्त हो रहे अद्वैत शैवागम की अति प्राचीन धारा पुनः जीवित हो उठी। स्वामी लक्ष्मण जी भी इस शंकरपल स्थान में जाकर अपनी साधना किया करते थे। स्वामी जी ने इस शिला के चारो ओर लकडी की एक घेराबन्दी भी की थी जो चित्र में स्पष्ट दिख रही है।

 


इस प्रकार, भारतीय संस्कृति व दर्शन में इस शंकरपल शिला का अन्यतम स्थान है। किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि कश्मीर के आम जन ऐसे साभ्यतिक व सांस्कृतिक महत्त्व के प्रतीक चिह्न “शंकरपल” से अनभिज्ञ हैं।

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