संयुक्त राष्ट्र के सैन्य पर्यवेक्षक की अब नहीं बची है जरुरत :-

06 Jan 2018 18:06:53

 


आशुतोष मिश्रा

 

 आज 6 जनवरी है ये वही दिन है, जब भारत ने 1948 में पाकिस्तान के भारत के हमले की शिकायत को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में गया था।  पकिस्तान द्वारा हमला करके जम्मू कश्मीर के जिस हिस्सों पर अपना कब्जा जमा लिया था उसे खाली करने के लिये भारत सुरक्षा परिषद् में गया था।  लेकिन आज भी इतने दिनों के बाद  पाकिस्तान और चीन द्वारा अवैध रूप से कब्ज़ा जमाये गए क्षेत्र को खाली कराने में सफल नहीं हो पाया है।      

महाराजा हरी सिंह जी ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर के जिस जम्मू कश्मीर राज्य का विलय भारत में किया था उसका कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमीटर था। लेकिन आज भारत के पास जो भूमि बची है उसका कुल क्षेत्रफल मात्र 1,01,387,वर्ग किलोमीटर है।  जिसमे से जम्मू 26,293वर्ग किलोमीटर, लद्दाख 59,146 वर्ग किलोमीटर तथा कश्मीर 15,948वर्ग किलोमीटर है।  शेष 1,20,849 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर पाकिस्तान और चीन ने अवैध रूप कब्जा कर के रखा हुआ है। जिसमे से पाकिस्तान ने 78,114 वर्ग किलोमीटर, और 37,555 वर्ग किलोमीटर  चीन ने कब्ज़ा कर रखा है। इसके साथ ही पकिस्तान 1963 में 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की भूमि को चीन को अवैध रूप से लीज़ पर दे रखा है ।                 

क्योकि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की धारा 35 के अंतर्गत आने वाले नियमों से वह सुरक्षा परिषद् में गया था। उसके बाद  संयुक्त राष्ट्र  की सुरक्षा परिषद् ने भारत पर पकिस्तान के हुए हमले के विषय पर वर्ष 1948  में छ: बिन्दुओं वाला एक प्रस्ताव लाया था।

  1. "पाकिस्तान पूरे जम्मू कश्मीर राज्य से अपनी सेना को वापस बुलाये क्योकि परिषद् इसे गैर कानूनी मानती है।"
  2. "आज़ाद जम्मू कश्मीर(पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर के आज़ाद कश्मीर की सरकार और सेना को अवैध माना था) की सरकार और सेना को प्रतिबंधित किया जाता है।"
  3. "पूरे जम्मू कश्मीर राज्य को फिर से एक किया जाना है, जैसा की ये 15 अगस्त 1947 के पहले एक था।"
  4. "पकिस्तान के आक्रमण के कारण जो लोग मीरपुर,गिलगित, मुजफ्फराबाद आदि जगह से विस्थापित हुए है उन्हें फिर से उनके घरों में वापस भेजना है।"
  5. "जम्मू कश्मीर राज्य में शांति और सुरक्षा के लिए भारत अपनी अवश्यकता के अनुसार जरुरी सुरक्षा बलों की तैनाती कर सकता है।"
  6. "अगर भारत चाहे तो भारत सयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में जनमत संग्रह करा सकता है।"

 

23 जनवरी 1957 को मेनन ने कश्मीर पर भारत के रुख का बचाव करते हुए आठ घंटे के एक अभूतपूर्व भाषण दिया। ' सुरक्षा परिषद् में पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के विलय को किसी भी तरह से चुनौती नहीं दे सकता हैं। अगर कोई दे सकता है वो बताये की वह किस नियम के तहत विलय को चुनौती दे रहा हैं। यहाँ  कोई विषय है तो पाकिस्तान का भारत पर हमले का विषय का हैं।1948 में सुरक्षा परिषद् ने एक प्रस्ताव ला कर भारत और पाकिस्तान को कुछ सुझाव बताये थे। इनमें से किसी भी सुझावों को पाकिस्तान ने कभी भी अमल में नहीं लाया था। जिसके बाद 1956 में भारत ने जम्मू कश्मीर राज्य का संविधान लाया था। और उस संविधान को जम्मू कश्मीर की जनता के सामने ले जा कर के उसका अनुसमर्थन कर लिया था। ऐसा है तो सुरक्षा परिषद या कोई और कैसे किसी जनमत संग्रह की की बात कर सकते है, हमारे लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं, उनके पास भाषण की स्वतंत्रता है, कई तरह की स्वतंत्रता है। हमारे लोग बार- बार और जगह- जगह अपने इन अधिकारों का उपयोग करते हुए काम करते हैं। फिर भी ऐसा क्यों है कि हमने संघर्ष विराम लाइन के दूसरी तरफ के लोगों की आवाजों और पाकिस्तान के अधिकारियों के दमन और अत्याचार क्यों नहीं दिखाई देता है। ऐसा क्यों है कि दस वर्षों में पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के इन लोगों ने एक मतपत्र भी नहीं देखा है?  

यूएनएमओजीआइपी की स्थापना 1949 में कराची समझौते के बाद हुई थी, जबकि 1972 में नई नियंत्रण रेखा वजूद में आई। लिहाजा, यूएनएमओजीआइपी जिस  नियंत्रण रेखा की निगरानी करने के लिए बनाया गया था, वह अब मौजूद ही नहीं है। क्योंकि 1972 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के बाद इसकी प्रासंगिकता ही खत्म हो गई है। इसलिए इसकी कोई जरुरत अब नहीं बची है। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून के प्रवक्ता स्टीफेन डुजारिक ने भी 2016 बता दिया कि,"सैन्य पर्यवेक्षक समूह कश्मीर की स्थिति पर नहीं बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर नजर रखने के लिए अधिकृत हैं।"

UNMOGIP का एक मुख्यालय 1 नवंबर से 30 अप्रैल तक इस्लामाबाद और 1 मई से 31 अक्टूबर तक श्रीनगर में रहता है। जबकि नई दिल्ली में इसका एक संपर्क कार्यालय स्थित है।  लेकिन इतने दिनों के बाद भी पाकिस्तान में UNMOGIP का कार्यालय केवल इस्लामाबाद में ही है।   आज तक पकिस्तान ने UNMOGIP को पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में अपना कार्यालय खोलने नहीं दिया है। जबकि पहले दिन से ही भारत ने UNMOGIP का कार्यालय श्रीनगर में खोलने की अनुमति दे दी थी। भारत में इसके दुसरे भी क्षेत्रीय स्टेशन जम्मू, बारामूला, पुंछ और राजौरी जिले में हैं।

UNMOGIP मई 2014 तक भारतीय सेना द्वारा प्रदान किये गए मुफ्त के स्थान से अपना संपर्क कार्यालय चलाता था । लेकिन इसकी ख़त्म होती प्रासंगिता को देखते हुए भारतीय सेना ने को UNMOGIP से अपना यह परिसर में खाली करने के लिए कहना पड़ा था। लेकिन फिर 2016-2017 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नए परिसर के निर्माण के लिए 2.8 मिलियन अमरीकी डालर आवंटित कर दिया था। UNMOGIP का पहला समूह भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू और कश्मीर में युद्ध विराम की निगरानी के लिए 24 जनवरी 1949 को पहली बार क्षेत्र में पहुंचा था। UN की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार इस समूह में 114 कर्मचारी हैं जिनमें 70 नागरिक और 44 विशेषज्ञ शामिल हैं।

1971 में बने सुरक्षा परिषद के आर्टिकल 307 के अनुसार UNMOGIP जम्मू कश्मीर और दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच में परमाणु हथियारों, नियंत्रण रेखा और सीमा रेखा पर होने वाले संघर्ष विराम के उल्लंघन के बारे में अपनी रिपोर्ट देता  है।

इस सैन्य समूह की विवादित क्षेत्र में होने वाली नियमित यात्राएं 4,500 से घटा 500 कर दी गई हैं, जबकि दोनों देशों में बने उनके ऑफिस के लिए होने वाली संविदात्मक सेवाओं और सामान्य परिचालन के लिए आवंटित बजट भी घटा दिया गया है। 2012-2013 में UNMOGIP ने अपनी आवंटित 5000 यात्राओं में से 4,864 क्षेत्रीय यात्राएं कि थी जबकि 2014-2015 की अवधि में 5000 के लक्ष्य के मुकाबले 4,468 क्षेत्रीय यात्राएं हुई थी। जबकि वर्ष 2016- 2017 की अवधि में हुई क्षेत्रीय  यात्रा के आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं।

अब ये साफ़ हो जाता है की इस प्रकार के किसी भी सैन्य पर्यवेक्षक समूह की जरुरत नहीं बची है। इसलिए अब  UNMOGIP को अपना बोरिया बिस्तर बंद कर के भरता से चले ही जाना चाहिये ।   

 

JKN Twitter