प्रश्न - सामाजिक और सामरिक विषय के रूप में भारत के लिए गिलगित - बल्तिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है? प्रश्न - सामाजिक और सामरिक विषय के रूप में भारत के लिए गिलगित - बल्तिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है?

09 Jan 2018 11:58:18

 

 

 

मुकेश कुमार सिंह

प्रश्न - सामाजिक और सामरिक विषय के रूप में भारत के लिए गिलगित - बल्तिस्तान क्यों महत्वपूर्ण है?

 

उत्तर - भारत में स्वतंत्रता के पश्चात जम्मू कश्मीर के तीन भाग बताए जाते है। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख। जबकि तथ्यात्मक रूप से यह ठीक नहीं है। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के अतिरिक्त गिलगित और बल्तिस्तान भी जम्मू कश्मीर का ही हिस्सा है। सही से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि जम्मू कश्मीर का यदि कोई सामरिक और आर्थिक महत्व है तो वह केवल गिलगित की वजह से है तो यह अतिशयोक्ति नहीं है। किन्तु 1947 में यह क्षेत्र पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया। यदि इतिहास को देखा जाय तो भारत में जितने भी बाह्य आक्रमणकारी आये वे इसी क्षेत्र से भारत में घुसे थे। भविष्य में यदि हमें ऐसे किसी आक्रमण को रोकना है तो इस क्षेत्र पर हमारा नियंत्रण होना ही चाहिए। परंपरागत रूप से हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला हमारी सीमा रही है और उसे बनाए रखना ही हमारे लिए हितकर होगा।

आर्थिक रूप से भी यह क्षेत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पश्चिम एशिया, केन्द्रीय एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया का सम्मिलन स्थल है। इसी गिलगित व्यापारिक मार्ग से भारत शेष विश्व के साथ व्यापार करता था। इस गिलगित मार्ग का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि उस समय में विश्व के कुल घरेलू उत्पाद में भारत कि हिस्सेदारी 25 से 30 प्रतिशत थी। परिणामस्वरूप भारत एक आर्थिक महाशक्ति था जिसे सोने की चिड़िया जैसे विशेषण प्राप्त था। 

गिलगित बल्तिस्तान एशिया में ताजे पानी के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है। भारत की दस सबसे बड़ी चोटियों में से 8 गिलगित बल्तिस्तान में है। इस क्षेत्र में सोने की खदानें भी पायी जाती है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन में छपी एक खबर के अनुसार पाकिस्तान मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन के सर्वे को माना जाए तो गिलगित बल्तिस्तान में सोने के 186 भंडार उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त गिलगित बल्तिस्तान के शिगार, स्कार्दू, हुंजा और गीजर में सफेद मार्बल के भंडार भी है।

 

प्रश्न - जम्मू कश्मीर में शांति की शुरूआत के लिए क्या करना चाहिए?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर का पिछले 70 वर्षो का सफर बहुत कुछ बयान करता है। वहां राष्ट्रवाद और अलगाववाद के बीच में निरंतर संघर्ष जारी रहा है। अलगाववादी शक्तियों ने प्रोपेगंडा का निरंतर सहारा लिया है। स्वतंत्रता की प्राप्ति के समय से लेकर आज तक भारत ने जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के थोपे गये 4 युद्धों को परोक्ष रूप से झेला और अपरोक्ष लड़ाई तो हमेशा ही जारी रही है। 1947 में पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के भींबर, कोटली, मीरपुर से ऐसा पलायन देखा कि आज तक इन क्षेत्रों के विस्थापित अपने घरो तक लौट नहीं पाये है। 1989 में कश्मीर क्षेत्र से हिन्दुओं का निष्कासन देखा। जम्मू कश्मीर में 1989 से लेकर 2007 तक आतंकवाद चरम पर था। लेकिन 2008 का अमरनाथ का आंदोलन जम्मू कश्मीर का एक टर्निंग पॉइंट था। पहली बार राष्ट्रवादी शक्तियों ने अलगाववादियों पर निर्णायक विजय प्राप्त की।

आज का आतंकवाद पहले जैसा नहीं है। अलगाववाद अलग-थलग पड़ चुका है। उसके दुष्प्रचार को लोग पूरी तरह से जान चुके है। यह समय जम्मू कश्मीर में कार्य करने का है। जम्मू कश्मीर के वास्तविक भूगोल, इतिहास और संस्कृति के बारे में लोगों के बीच में जागृति लाने की आवश्यकता है। जम्मू कश्मीर को लेकर तीन मुख्य मिथक प्रचलित है कि जम्मू कश्मीर को अनुछेद 370 में विशेष दर्जा प्राप्त है, जम्मू कश्मीर का अधिमिलन पूर्ण नहीं है और जम्मू कश्मीर अलगाववादी राज्य है। जम्मू कश्मीर में प्रचलित इन मिथकों का तथ्यपरक विश्लेषण कर उन्हें दूर करने की जरूरत है। इसके लिए जम्मू कश्मीर में रहने वाले राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने का कार्य भी किया जाना चाहिए। यह राष्ट्रवादी ताकतें राज्य के विभिन्न क्षेत्रों जैसे जम्मू, पुंछ, गुरेज, कारगिल, लेह, और लोलाब जैसे क्षेत्रों में बसी है। यदि इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका मिलेगा तो जम्मू कश्मीर के हालातों में और अधिक सुधार आएगा।


प्रश्न - अनुच्छेद 370 कश्मीर के राजनैतिक नेताओं के लिए कवच के रूप में काम करती है। लेकिन क्या यह सच है कि राज्य में रहने वाले लोग छोटी से छोटी चीजों के लिए तरस रहे है?

 

उत्तर - भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कोई अनुच्छेद होगा जिसके विषय में इतना कुछ लिखा व पढ़ा गया होगा। किन्तु बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि इस अनुच्छेद की समझ रखने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। एक ओर जहां यह भ्रम खड़ा करने की कोशिश की गई कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करता है तो दूसरी तरफ पूरे देश में विशेषकर जम्मू कश्मीर में यह भय खड़ा करने की कोशिश की गई कि यदि अनुच्छेद 370 समाप्त हो गई तो राज्य में शेष भारत से लोग जमीन खरीद लेंगे और फिर राज्य की डेमोग्राफी में परिवर्तन आ जायेगा। यह भी जम्मू कश्मीर को लेकर फैलाये गये भ्रमों में से एक है। जबकि संविधान की सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति भी संविधान देख कर यह बता सकता है कि अनुच्छेद 370 केवल एक अस्थायी अनुच्छेद है। सविधान में अनुच्छेद 370 के मार्जिनाल नोट में “अस्थायी” शब्द स्पष्ट रूप से अंकित है, किन्तु पिछले 67 वर्षो में 370 की आड़ में जम्मू कश्मीर और शेष भारत में रहने वाले लोगों के साथ राजनीतिक धोखाधड़ी हुई है। इस अनुच्छेद का संवैधानिक दुरूपयोग हुआ है। पहली बात जो पूरी तरह से स्पष्ट होनी चाहिए कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को कोई विशेष दर्जा नहीं देता है। यह मात्र एक प्रक्रियात्मक तंत्र था जो कि समय के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से समय के साथ इसके उचित उपयोग के स्थान पर दुरूपयोग होना शुरू हो गया। परिणामस्वरूप अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर की आम जनता के लिए नहीं बल्कि वहां के राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों के लिए विशेष हो गया।

समय के साथ और परिस्थितियों के अनुसार भारतीय संविधान में संशोधन कर अनेक कल्याणकारी और प्रगतिशील प्रावधान जोड़े गये। परिणामस्वरूप, पंचायती राज एक्ट, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भ्रष्टाचार निरोधक जैसे और भी कई अनुच्छेद अस्तित्व में आये और आम जन के लिए लाभकारी भी रहे। लेकिन जम्मू कश्मीर में आज भी यह लाभकारी योजनायें और प्रावधान का लाभ आम जनता को नहीं प्राप्त हुआ है। जम्मू कश्मीर के जनजातीय समाज को चुनावी आरक्षण प्राप्त नहीं है। जबकि राज्य में लगभग 14 से 16 प्रतिशत जनजाति समाज के लोग रहते है। जम्मू कश्मीर का सूचना का अधिकार एक्ट बहुत कमजोर है। पंचायती राज से जुड़े हुए 73वें एवं 74वें संशोधन आज भी जम्मू कश्मीर में लागू नहीं है। केवल 5 बार वहां पंचयातों के चुनाव हुए है। पंचायती राज से जुड़े संशोधन लागू करने में वहां के शीर्ष नेतृत्व का दोगलापन पूर्व गृह सचिव जी. के. पिल्लई के उस बयान से स्पष्ट हो गया था जिसमें केंद्र सरकार के पंचायतों को और अधिक शक्तियां प्रदान करने के लिए कहा गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह कह कर इस बात का विरोध किया था कि यदि उसने पंचायती राज एक्ट लागू कर दिया तो उसके विधायकों का महत्व कम हो जायेगा।

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 का लाभ केवल मात्र एक विशेष वर्ग को प्राप्त हुआ है। इसका एक प्रमुख उदाहरण राज्य की विधानसभा के कार्यकाल को लेकर है। देश में 42वां सविधान संशोधन किया गया जिससे देश के सभी राज्यों की विधानसभा के कार्यकाल 5 से 6 साल कर दिया गया। यह संशोधन जम्मू कश्मीर में एकदम से लागू कर दिया गया। किन्तु 44वां संविधान संशोधन के द्वारा पुनः सभी राज्यों में विधानसभा का कार्यकाल फिर 6 से 5 साल कर दिया गया। लेकिन जम्मू कश्मीर में यह संशोधन लागू नहीं किया क्योंकि यह सीधे वहां के सियासी लोगों को लाभ पहुंचा रहा था। वहां आज भी विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष है। जिसका लाभ केवल विधायकों और मंत्रियों को मिलता है। जम्मू कश्मीर में आज तक जन प्रतिनिधित्व अधिनियम पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। 2013 तक भारतीय संविधान के मात्र 260 अनुच्छेदों को जम्मू कश्मीर में लागू किया गया था।

 

 

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