कुशक बकुला की तिब्बत यात्रा

14 Feb 2018 13:06:29

 

 

कुशक बकुला ने अपना अध्ययन तिब्बत से किया था लेकिन अब तिब्बत के हालात दिन-प्रतिदिन बदल रहे थे। तिब्बत को  चीन की लाल छाया ग्रस रही थी । वहाँ बौद्ध वचनों पर संकट उपस्थित हो गया था । चीन तिब्बत को अपना ग़ुलाम बना रहा था। कुशक बकुला सन् 1954 में खंग रिंपोछे (कैलाश-मानसरोवर) की यात्रा पर गये। उन्होंने वहां चीन का साया प्रत्यक्ष अनुभव किया। वापिस लौट कर वे उसी वर्ष आयोजित होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल को लेकर  रंगून (म्यांमार) गये। अगले ही वर्ष वे भारत सरकार के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में तिब्बत की यात्रा पर गये।

 

तिब्बत की राजधानी ल्हासा के द्रेपुंग विश्वविद्यालय से कुशक बकुला ने अपनी पढ़ाई  की थी और वहीं से गेशे की डिग्री प्राप्त की थी। लेकिन उन दिनों चीन पर माओ की साम्यवादी पार्टी ने क़ब्ज़ा नहीं किया था। लेकिन अब डेढ़ दशक बाद  सब कुछ बदल गया था। चीन साम्यवादी चोला ओढ़ चुका था और उसने तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया था। उसकी सेना ल्हासा में पहुँची हुई थी। चीन वहाँ से बौद्ध मत को समाप्त करने का प्रयास तो कर ही रहा था,  इसके साथ ही तिब्बत  की भाषा और संस्कृति को भी समाप्त करने में लगा था। किसी साम्यवादी शासन व्यवस्था में स्थानीय धर्म, संस्कृति और परम्पराओं की क्या दुर्गति हो सकती है, इसका व्यावहारिक रूप कुशक बकुला ने पहली बार तिब्बत में ही देखा।

 

कुशक बकुला लगभग दो महीने ल्हासा में रहे। उन्होंने वहाँ अनेक  लोगों से मुलाक़ात की और तिब्बत में उभर रही नई राजनैतिक व्यवस्था को समझा  और तिब्बतियों के भीतर की बेचैनी को भी देखा। तिब्बत के चौदहवें दलाई लामा  पर आने वाले संकट को भी वे स्पष्ट देख पाए। वे समझ गए थे कि निकट भविष्य  में दलाई लामा को निर्वासित होकर भारत आना पड़ेगा। भारत वापिस आकर  उन्होंने प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से भेंट की और तिब्बत पर आ  चुके संकट और भविष्य में आने वाले तूफ़ान से अवगत करवाया। उन्होंने यह  आशंका भी जताई कि भविष्य में चीन भारत पर भी आक्रमण कर सकता है।  नेहरु  कितना समझ पाए, कितना नहीं,  इसके बारे में तो अनुमान ही लगाए जा सकते हैं  लेकिन कुशक बकुला का तिब्बत को लेकर किया गया आकलन सही निकला और तिब्बत पर चीन ने पूरी तरह आधिपत्य जमा लिया व दलाई लामा को अपने साथियों सहित भारत  में शरण लेनी पडी ।

भारत सरकार ने 1956  में भगवान बुद्ध की 2500वीं जयन्ती राष्ट्रीय स्तर पर मनाने का निर्णय किया। तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा० राधाकृष्णन की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया,  जिसमें कुशक बकुला भी सदस्य बनाए गए। इस अवसर पर तिब्बत से दलाई लामा और पंचेन लामा भी आए थे।  दिल्ली में भव्य समापन कार्यक्रम हुआ। कुशक बकुला ने लद्दाख में भी भगवान  बुद्ध की पच्चीस सौवीं जयन्ती के अवसर पर भव्य आयोजन किए,  जिससे वहाँ के  समाज में नव-प्राण, नव-चेतना का संचार हुआ ।

 

[यह उद्धरण कुशोग बकुला पर लिखी पुस्तक "आधुनिक लद्दाख के निर्माता - उन्नीसवें कुशोग बकुला लोबजंग थुबतां छोगनोर" में से लिया गया है, पुस्तक के लेखक हैं डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, जिनका जम्मू कश्मीर विषय पर गहन अद्धयन है I पुस्तक के बाकी अंश भी आने वाली लेख श्रंखला में प्रकाशित किये जाएंगे]

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