स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है देथा मन्दिर

15 Feb 2018 12:03:05

वराहमूल (बारामूला) से उरी के रास्ते में वितस्ता नदी के बाये तट पर एक पहाडी के नीचे देथा मन्दिर स्थित है। इस स्थान का नाम बाँदी है । यह मन्दिर सम्भवतः 10 वीं शताब्दी का है। इस मन्दिर का निर्माण किसने किया, इसकी जानकारी नहीं है । इस मन्दिर को लोग  “दाता मन्दिर” भी कहते हैं । किन्तु इस मन्दिर का सही नाम देथा मन्दिर है । यह मन्दिर सम्भवतः भगवान् शिव को समर्पित है।


(चित्र १: मन्दिर परिसर का केन्द्रीय कक्ष)

एक आमलक भी प्रांगण में पडा हुआ है । आमलक मन्दिरों के शीर्ष पर रहने वाले कलश को आधार प्रदान करता है । शिल्पग्रन्थ “मयमतम्” के अनुसार आमलक वृत्ताकार होता है।

 

मन्दिर के प्रांगण में एक स्तम्भ भी पडा हुआ है । मन्दिर का मुखद्वार उत्तर दिशा में है । मन्दिर के प्रांगण में एक केन्द्रीय कक्ष है जिसमें मुख्य देवता शिव का लिंग स्थित था । मन्दिर के प्रांगण में देवता का एक पीठ (आसन) भी देखने को मिलता है । कश्मीर में पीठ का वास्तुकला की दृष्टि से अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । पीठ का निर्माण, मूर्ति-निर्माण के समान ही पवित्र माना गया है ।

मन्दिर के प्रांगण में उत्तर-पश्चिम दिशा में दो छोटे-छोटे मन्दिर थे जो सम्भवतः पार्श्व देवता के रहे होगें ।


(चित्र ३: पार्श्व देवता के मन्दिर)

देथा  मन्दिर न केवल कश्मीर अपितु भारतीय स्थापत्य व मूर्त्ति कला की उत्कृष्टतम कृतियों में से एक है।

 

 

 

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