शौर्य के प्रतीक शहीद हवलदार हंगपन दादा की वीर गाथा

16 Feb 2018 11:19:46

 


शुभम पांडे

शुक्रवार, 9 फरवरी 2018: यह सवाल मन में अकसर उठता है कि हमारे देश के प्रतिनिधि आखिर कौन होते है ? क्या वे पाँच साल के लिए चुने हुए नेता होते हैं या दूसरे देशों में नवाचार के तहत, अपनी गाड़ियों के आगे भारतीय ध्वज लगाए दूतावास के अधिकारी होते हैं ? उल्लेखनीय है कि यह सभी देश की प्रशासन व्यवस्था का विश्व पटल पर प्रतिनिधित्व करते है, जबकि रहन-सहन, व्यावहारिकता, कला, साहित्य और सांस्कृतिक धरोहरों के प्रदर्शक उसके नागरिक होते है। पर इन सभी से भी कहीं बढ़कर एक ऐसा समूह है, जो सच्चे मायनों में देश का प्रतिनिधि होने का गौरव रखता हो, तो वह हमारे बहादुर सैनिक हैं।

 

एक सैनिक, जो सिर्फ देश के लिए जीता है और उसकी हिफाज़त में अपनी शहादत देता है, जिसका मज़हब सबसे पहले हिंदुस्तानी होता है तथा एक धार्मिक ग्रंथ के समान, भारतीय संविधान का पालन उसका परम कर्तव्य होता है। वह राष्ट्र की एकता और संप्रभुता के लिए अपनी जिंदगी न्योछावर कर देते है, तिरंगे के सम्मान में अपना सर्वस्व लगा देते है। कितनी ही खराब मौसम की मार हो या सरहद के उस पार, हमले की ताक पर बैठे बेरहम दुश्मनों की टोली, यह भारतीय सेना ही है जिसके बदौलत हम अपने घरों में सुकून से रहते है, यह सोचकर कि हमारी सलामती के लिए वतन के वो बहादुर रखवाले हर दम अपनी जान लड़ाते हैं। उनके वीरता से भरे कारनामे हमें जोश और देशभक्ति के जस्बे से भर देते है। ऐसे ही वीर भारतीय जवानों में से एक, शौर्य के प्रतीक शहीद हवलदार हंगपन दादा की वीर गाथा देशवासियों में समर्पित भाव से राष्ट्र के प्रति कुछ करने का हौसला देती है।

 

भारत शुरु से ही अपने दुश्मनों की आँखों में खटकता रहा है। चाहें वह दुश्मन कोई देश हो या उसके पाले-पोसे हुए दहशतगर्द। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह ताकतें आज़ादी के बाद के सफर में भारत की तरक्की में चुनौती रहीं, जिसका सभी देशवासियों ने जमकर मुकाबला भी किया।

 

वैसे तो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और उसके सरपरस्त आतंकवादी मिलकर भारत में तरह-तरह के षड्यंत्र रचते रहते है, जिसे करते हुए एक बार भारतीय जवानों को ललकारने का दुस्साहस कर बैठे। वह साल 2016 के 26 मई का दिन था, जब चार आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के नौगाम सेक्टर में नियंत्रण रेखा से घुसपैठ की। यह सभी भारी मात्रा में गोला-बारूद के साथ कोई बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने के इरादे से आगे बढ़ रहे थे। समुद्री तल से करीब तेरह हज़ार फीट की ऊँचाई वाला यह क्षेत्र लगभग पूरे साल बर्फ से ढका रहता है। खुफिया जानकारी के आधार पर हवलदार हंगपन दादा के नेतृत्व में सेना ने इलाके को चारों ओर से घेर लिया और छानबीन शुरू की। वहीं पत्थरों और झाड़ियों में छिपे आतंकवादी गोलीबारी करने लगे। आतंकवादियों एवं सेना के बीच कई राउंड की यह फायरिंग पूरे चौबीस घंटे होती रही। ऑपरेशन खत्म होने में विलंब एवं कठिनाई को देखते हुए हवलदार हंगपन दादा ने अब स्वयं मोर्चा संभाला। उन्होंने दो दहशतगर्दों को नजदीक से ही मार गिराया। इस कार्यवाही में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। अपने ज़ख्मों की परवाह किए बिना उन्होंने बचे हुए आतंकियों का पीछा किया। उन्होंने तीसरे आतंकी को हाथापाई में ही मार दिया और इस तरह इन्होंने ऑपरेशन के दौरान, तीन आतंकवादियों को अकेले ही मार गिराया। चौथे आतंकी का सफाया करते हुए गंभीर रूप से घायल हवलदार हंगपन दादा वीरगति को प्राप्त हो गए।

 


उनके इस साहसपूर्ण कार्यवाही से ना सिर्फ भारी मात्रा में हथियारों से लैस आतंकवादियों के खौफनाक मंसूबों पर पानी फेर दिया, बल्कि अपने साथियों की जान भी बचाई। उन्होंने अत्यंत साहसिक कार्यकुशलता और भारतीय सेना के उच्चतम मानकों का पालन करते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। हवलदार हंगपन दादा के इस अदम्य पराक्रम के लिए वर्ष 2017 के गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मरणोपरांत शांतिकाल का शीर्ष सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया, जिसे उनकी पत्नी श्रीमती चासेन लवांग को प्रदान किया गया। यह लम्हा एक सैनिक के लिए किसी सपने से कम नहीं होता जब उसके शौर्य के लिए देश के महामहिम राष्ट्रपति, जो कि सेना के तीनों अंगों का कमांडर होता है, उसके हाथों जीते जी या मरणोपरांत सम्मानित हो सके।


अरुणाचल प्रदेश के बोदुरिया गाँव के रहने वाले शहीद हवलदार हंगपन दादा साल 1997 में भारतीय सेना में शामिल हुए, जो कि असम रेजिमेंट के 35वीं बटालियन राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे। अपने साथियों के बीच ‘दादा' नाम से परिचित हवलदार हंगपन दादा दो बच्चो के पिता थे, दस साल की बेटी रौखिन और छह साल का बेटा सेनवांग। यह देश के प्रति उनका सच्चा प्यार ही था जिसके चलते उन्होंने इसकी सेवा के लिए एक कठिन रास्ता अपनाया, जिस पर कुछ भाग्यशाली लोग ही चल सकते है। उनकी यह शौर्य गाथा आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी है, जिसे समस्त भारतवासी अपने इस योद्धा को नमन करते है।

 

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