मंगोलिया के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में कशुक बकुला का योगदान

17 Feb 2018 11:54:00


 

मंगोलिया के साथ भारत के प्राचीन काल से सांस्कृतिक सम्बंध रहे है। आधुनिक काल में  भी ये सम्बंध प्रगाढ होते रहे। जिन दिनों चीन पूरे मंगोलिया को निगलने का प्रयास कर रहा था और मंगोलिया अपनी रक्षा का प्रयास कर रहा था, उन्हीं दिनों उसने अपने इन प्रयासों में रूस के साम्यवादी शासन की सहायता ली। यद्यपि यह प्रयास आकाश से गिरकर खजूर में लटकने जैसा था लेकिन उन परिस्थितियों में शायद और कोई विकल्प नहीं था। इनर मंगोलिया चीन के पंजे  में आ चुका था। आउटर मंगोलिया ने विद्रोह करके 1924  में ही वहाँ  साम्यवादी सरकार स्थापित कर ली,  इसलिए उसे रूस का समर्थन प्राप्त हो गया।  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरे सोवियत ब्लाक ने आउटर मंगोलिया को  मान्यता देकर उसे चीन की गिद्ध-दृष्टि से बचा लिया।  सोवियत  ब्लाक के बाहर भारत पहला देश था जिसने  मंगोलिया जन गणतंत्र को राजनैतिक मान्यता दी  और उसके साथ दौत्य सम्बंध स्थापित किए। उसके बाद मंगोलिया संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता के लिए प्रयास कर रहा था। लेकिन चीन इसका डट कर विरोध कर रहा था, क्योंकि चीन का कहना था कि पूरा मंगोलिया चीन का हिस्सा है। यहां तक कि मंगोलिया की सदस्यता का विरोध करने में माओ और च्यांग-काई-शेक एकमत थे। लेकिन भारत ने उस समय मंगोलिया का डटकर समर्थन किया। कहा जा सकता है कि भारत मंगोलिया के हर सुख दुख में साथ रहा है। जिस प्रकार तिब्बत के लोगों का भारत में गहरा विश्वास है उसी  प्रकार मंगोलिया के लोगों का भी भारत में गहरा विश्वास है।

 

मंगोलिया के लोकसाहित्य में एक कथा  शताब्दियों से प्रचलित है। एक समय ऐसा आएगा जब मंगोलिया में बौद्ध वचनों  पर संकट आ जाएगा। विहार में जाने वाले भक्तों को शासक दल के लोग प्रताड़ित  करेंगे। बौद्ध विहारों को गिरा दिया जाएगा। त्रिपिटकों को जला दिया  जाएगा। मंगोलिया में किसी भिक्षु के दर्शन करना कठिन हो जाएगा। लेकिन  निराशा का यह कठिन कालखंड ज़्यादा देर नहीं रहेगा। फिर एक दिन भारत से  अर्हत बकुला के अवतार मंगोलिया में आएँगे और यहाँ पुनः बौद्ध वचनों का  प्रसार होगा। मंगोलिया में जब साम्यवादी शासन शुरु हुआ तो लोगों को इस लोककथा में सत्यता का आभास होने लगा। मंगोलिया में साम्यवादी शासन के दिनों में सरकार ने पूरी तरह कोशिश की थी कि मंगोलिया से बौद्ध वचनों के  प्रभाव को समाप्त कर दिया जाए। वहाँ बौद्ध विहारों पर एक प्रकार से प्रतिबन्ध ही लगा हुआ था। देश ने अपने आप को निरीश्वरवादी घोषित किया हुआ था । 1924  से ही देश पर मंगोलिया जन क्रान्तिकारी दल का एकाधिकारवादी शासन  था और वह सोवियत रूस का पिछलग्गू बना हुआ था। कम्युनिस्टों ने बौद्ध धर्म ग्रन्थों को जला दिया था।

 

मंगोलिया में तीन सौ से भी ज्यादा मठ थे और वहाँ की एक तिहाई  जनसंख्या मठों में भिक्षु थी। साम्यवादी शासन ने बौद्ध  मठों को गिरा कर भिक्षुकों को वहाँ से निष्कासित कर दिया था। शासन ने  भिक्षु संघों को प्रतिबन्धित कर दिया। बौद्ध दर्शन व साहित्य के अध्ययन और साधना को लगभग समाप्त कर दिया। लेकिन मंगोलिया के लोगों के ह्रदय के भीतर  घर किए गए बौद्ध वचनों को मिटाना क्या इतना आसान था ? कुशक बकुला की दृष्टि सदा मंगोलिया में हो रहे बौद्ध वचनों के इस संहार की ओर ही लगी रहती  थी क्योंकि तिब्बत में वे यह सब कुछ प्रत्यक्ष देख चुके थे। उन्होंने टिप्पणी भी की थी, "बुद्ध वचनों के प्रचारक पश्चिम की ओर जा रहे हैं  क्योंकि वहाँ जाना आसान भी है और सुविधापूर्ण भी।"  जहां सचमुच बौद्ध वचन संकट में हैं,  उधर का रुख़ कौन करता है ?  क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की  सुविधा नहीं है।  सन 1970 में कुशक बकुला मंगोलिया की यात्रा पर गये। इससे पहले वे 1968  में साम्यवादी रूस की यात्रा कर आए थे। वहाँ उन्होंने  बुरयात बौद्धों की दुर्दशा देखी थी। अब मंगोलिया में बौद्ध समाज का  उत्पीड़न उन्होंने स्वयं अपनी आँखों से देखा। यहाँ भी वे बौद्ध मठों के  भग्नावशेषों को देख रहे थे। पददलित चीवर साम्यवादियों के अत्याचारों की साक्षी दे रहे थे। मंगोलिया में उन परिस्थितियों में कुशक बकुला का आगमन साम्यवाद की तप्त हवाओं में ठंडी हवा का एक झोंका था। बुद्धम् शरणम् गच्छामि की एक मद्धम ध्वनि। मंगोलिया के लोगों ने इसे स्पष्ट सुना। शायद  कशुक बकुला मंगोलिया के लोगों को अपने भविष्य में आने के प्रति आश्वस्त कर रहे थे।

 

दो दशक बाद सचमुच वही घटित होने लगा जिसकी किसी  ने कल्पना भी नहीं की थी। बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक विश्व इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दशक बन गया। सोवियत संघ में दरारें पड़नी शुरु हो गईं।  लोकतंत्र की आवाजें उठने लगीं। देखते-देखते मध्य एशिया के वे सब देश जो  अब तक रूस की छाया में सिकुड़े हुए थे,  वे आकार ग्रहण करने लगे। शायद मंगोलिया के लिए भी वह कालखंड आ गया था जिसकी प्रतीक्षा वहाँ के लोग शताब्दियों से कर रहे  थे। भारत से कुशक बकुला के आने की प्रतीक्षा।

 

भारत के प्रधानमंत्री राजीव गान्धी ने 1990 में कुशक  बकुला को मंगोलिया में भारत के राजदूत बना कर उलान बातोर भेजा। यह काल  मंगोलिया के इतिहास का संक्रमण काल था। वहाँ की साम्यवादी सरकार के  ख़िलाफ़ युवा पीढ़ी का विद्रोह शुरु हो चुका था। उलान बातोर का सुखबतार  चौक लोकतांत्रिक प्रदर्शनकारियों का केन्द्र बन गया था। यह सत्तर साल के  साम्यवादी शासन के अन्त की पूर्वपीठिका थी। मार्च 1990  तक आते-आते सुखबतार  चौक पर प्रदर्शनकारियों की संख्या लाखों तक पहुँच गई थी। साम्यवादी शासक दल के सशस्त्र बल भी सन्नद्ध थे। दोनों पक्ष आमने-सामने थे। किसी  समय भी हिंसा भड़क सकती थी। नरसंहार हो सकता था। एक साल पहले ही चीन के  तियानमेन चौक पर चीन की साम्यवादी सरकार द्वारा अपने ही प्रदर्शनकारियों का किया गया नरसंहार लोगों की स्मृति में अभी भूला नहीं था। उसकी पुनरावृत्ति यहाँ भी हो सकती थी। दोनों पक्ष आमने-सामने डटे थे। कौन उनको  संवाद की स्थिति में ला सकता था ?  दोनों पक्षों की सहमति भारत के राजदूत  कुशक बकुला पर बनी। कुशक बकुला ने दोनों पक्षों से बातचीत की और दोनों को  किसी भी स्थिति में हिंसा का प्रयोग न करने के लिए कहा। दोनों पक्ष इसके  लिए सहमत हुए। संवाद का रास्ता खुला और इस संवाद ने बिना एक भी गोली चलाए  देश का इतिहास बदल दिया। मंगोलिया में साम्यवादी शासन के अन्त की शुरुआत हो गई।
कुशक बकुला की नियुक्ति दो साल के लिए की गई थी  लेकिन एक बार वे वहाँ जाकर रम गए तो दस साल तक वहीं भारत के राजदूत बन कर  रहे । मंगोलिया में बुद्ध वचनों और विहारों को पुनर्जीवित करने में उनका सर्वाधिक योगदान रहा। साम्यवादियों द्वारा किए गए मंगोलिया के इस सांस्कृतिक विनाश को देखकर वे बहुत दुखी हुए। वे समझ गए, "भिक्खुओं की नई  पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में अब अनेकों वर्ष लग जाएँगे। लेकिन एक बार  दलाई लामा के आ जाने से मंगोलिया में पुनः धर्म के प्रति जन-ज्वार उमड़ेगा।”  

 

युवा पीढ़ी पुनः महाविहारों की ओर आकर्षित होगी और मंगोलिया अपने वास्तविक  स्वरूप को प्राप्त कर लेगा। 1997 में दलाई लामा धर्मशाला से मंगोलिया  पहुँचे। लगभग सत्तर साल बाद एक बार फिर मंगोलिया में भगवान बुद्ध की  जयन्ती मनाई गई। इस अवसर पर कुशक बकुला ने अवलोकितेश्वर के मंत्रों का पाठ किया। 1992 में कुशक बकुला के प्रयासों से मंगोलिया बौद्ध परिषद की स्थापना हुई। कुशक बकुला ने अनुभव किया कि यदि भगवान बुद्ध के  कुछ अवशेष  मंगोलिया में लोगों के दर्शन के लिए रखे जाएँगे तो लोगों में सुप्त  चेतना  पुनः जागृत हो जाएगी। उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि बुद्ध के कुछ  अवशेषों को मंगोलिया में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा जाए। भारत सरकार  ने उनके इस आग्रह को स्वीकार किया और पहली बार 1993 में बुद्ध के अवशेष  मंगोलिया में प्रदर्शित किए गए। इससे उमड़े जन-ज्वार का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सुदूर पठारों में भेड़-बकरियाँ चराने वाले चरवाहों से  लेकर देश के राष्ट्रपति तक एक ही पंक्ति में दर्शन के लिए खड़े थे। 1994  में कुशक बकुला के प्रयासों से मंगोलिया में कालचक्र दीक्षा का आयोजन किया  गया। इस अवसर पर प्रवचन के लिए एक बार पुनः धर्मशाला से दलाईलामा को  आमंत्रित किया गया।


कुशक बकुला स्वयं बौद्ध समाज में गेलुग्पा सम्प्रदाय के थे लेकिन उनका प्रयास था कि मंगोलिया के बौद्ध समाज में एकता और समरसता के लिए अन्य सम्प्रदायों के विद्वानों को भी बुलाया जाना चाहिए। इसी कारण से उन्होंने 1995 में शाक्य सम्प्रदाय के ठिपोन रिम्पोछे को मंगोलिया आमंत्रित किया। रिम्पोछे ने अनेक लोगों को धम्म शिक्षा दी और उन्हें  भिक्खुसंघ में दीक्षित भी किया। कुशक बकुला मंगोलिया में दस साल तक रहे। सैकड़ों बन्द हो चुके गोम्पाओं को उन्होंने पुनः खुलवाया। अनेकों बौद्ध शान्ति सम्मेलनों का आयोजन किया। उनके प्रयासों से उलानबतार में बौद्ध अध्ययन के लिए एक महाविद्यालय की स्थापना की गई। महाविद्यालय के लिए भारत से बौद्ध ग्रन्थ मँगवाए गए। मंगोलिया में जो युवा भिक्खुसंघ में दीक्षित हुए उन्हें उच्च अध्ययन के लिए बकुला ने धर्मशाला और सारनाथ भिजवाया। भारत से बौद्ध विद्वानों को मंगोलिया बुलाया गया। कुशक बकुला ने बदली  परिस्थितियों में सारे देश में बुद्ध वचनों का उपदेश देते हुए यात्रा की।  कुशक बकुला के प्रति मंगोलिया के लोगों की श्रद्धा इतनी थी कि पुराने  बुज़ुर्ग भिक्षु धरती पर लेटकर उन्हे साष्टांग प्रणाम करते दिखाई देते थे।  युवा लड़के केवल उनके हस्ताक्षर और आशीर्वाद लेने के लिए पंक्तियों में  खड़े रहते थे। कुशक बकुला उनकी कलाई में मौली बाँध कर आशीर्वाद देते थे।  सत्तर साल में नष्ट हो चुकी बौद्ध परम्पराओं को पुनः जीवित करने का  महत्वपूर्ण कार्य करने में कुशक बकुला की भूमिका सचमुच ऐतिहासिक ही मानी जाएगी। मंगोलिया और रुस में बौद्ध मत को पुनर्जीवित करने और उनका भारत के  निर्वासित तिब्बती समुदाय से सम्पर्क स्थापित करवाने में उन्होंने  महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने मंगोलिया में अनेक युवाओं को बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षा दी।  बकुला ने 1999 में उलान बतार में The Bakula Rinpoche Süm की स्थापना की । उलानबतोर में नष्टप्राय हो चुके पेठुप गोन्पा को पुनः स्थापित करने और उन्हें बौद्ध क्रिया-कलापों का केन्द्र बनाने में बकुला ने दिन रात एक कर दिया। कालान्तर में कुशक बकुला का यह पारम्परिक मठ बौद्ध शिक्षा का एक बड़ा केन्द्र बना। मंगोलिया में बकुल रिंपोछे के बहुमूल्य योगदान को ध्यान में रखते हुए महान् मंगोलियाई भिक्षु विद्वान जावा दम्दीन ने अर्हत बकुल की प्रशंसा में एक स्तुति की रचना की,  जिसे मंगोलिया के सभी बौद्ध-विहारों में पढ़ा जाता है। बकुल रिंपोंछे के सम्मान में मंगोलिया में एक विशेष थंका का निर्माण किया गया। यह  थंका सम्पूर्ण मंगोलिया में अद्भुत एवं अद्वितीय है, जो आज भी वहां संरक्षित है।

 

[यह उद्धरण कुशोग बकुला पर लिखी पुस्तक "आधुनिक लद्दाख के निर्माता - उन्नीसवें कुशोग बकुला लोबजंग थुबतां छोगनोर" में से लिया गया है, पुस्तक के लेखक हैं डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, जिनका जम्मू कश्मीर विषय पर गहन अद्धयन है I पुस्तक के बाकी अंश भी आने वाली लेख श्रंखला में प्रकाशित किये जाएंगे]

 

 

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