उपसंहार: कुशक बकुला

19 Feb 2018 17:07:05

 


कुशक बकुला के उन्नीसवें अवतार की यात्रा पूरी हुई थी। अब वे कब और कहां अवतार लेंगे, इसकी परम्परागत ढंग से सूक्ष्म पड़ताल शुरु हो गई थी। अन्त्येष्टि के दौरान कुछ विशिष्ट चिह्न प्रकट हुए। अन्त्येष्टि के चौथे दिन जब कुछ भिक्षु एवं सामान्यजन अंत्येष्टि स्थल पर पवित्र राख का संग्रह करने के लिये गये तब वहां अप्रत्याशित रूप से हिमपात हुआ। हिमपात के दौरान हिमपंखुड़ियां मात्र उस स्थान पर गिरीं जहां भिक्षु श्वेत वस्त्रों से आवृत्त थे, जबकि आकाश पूर्णतः साफ था। अंत्येष्टि स्थल के अंदर बालू पर युवा और वृद्धा अवस्था के पदचिन्ह दिखी पड़े जो उनके संभावित अवतार का संकेत था। पेठुप गोम्पा के आंगन में उन्नीसवें कुशक बकुला रिंपोछे के सिंहासन के समक्ष आश्चर्यजनक रूप से अर्हत बकुला का नेवला प्रकट हुआ। आश्चर्य की बात यह थी कि वह शान्त रहा और वहां उपस्थित मानव समुदाय से  भयभीत नहीं हुआ। बाद में नेवला गोम्पा में रिंपोछे के कक्ष में भ्रमण करने लगा और भिक्षु सेवकों द्वारा कुछ भी चीज देने पर उसे खाने और पीने लगा। यह विचित्र प्रसंग लगभग दो महीनों तक जारी रहा जब तक कि गोम्पा में रिंपोछे  की नवीन प्रतिमा का निर्माण और अभिषेक भिक्षुओं के द्वारा नहीं कर दिया गया। उक्त नेवले की लीला को भिक्षुओं द्वारा कैमरे में कैद कर लिया गया। वे  छायाचित्र आज भी उनके कमरे में देखे जा सकते हैं। उन्नीसवें कुशक बकुला के देहत्याग देने के दो साल बाद 24  नवम्बर 2005, को लद्दाख की नुब्रा घाटी के क्यागर ग्राम में एक बालक का जन्म हुआ। विभिन्न पद्धतियों से जाँच कर लेने के बाद यह निश्चित हो गया कि यही बालक उन्नीसवें बकुला का अवतार है। बालक का नाम तेनजिंग नवांग जिगमेत वांगचुक हुआ और उसे 6 अगस्त 2010  को लद्दाख के स्पितुक गोम्पा में अभिषिक्त किया गया।

 

[यह उद्धरण कुशोग बकुला पर लिखी पुस्तक "आधुनिक लद्दाख के निर्माता - उन्नीसवें कुशोग बकुला लोबजंग थुबतां छोगनोर" में से लिया गया है, पुस्तक के लेखक हैं डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, जिनका जम्मू कश्मीर विषय पर गहन अद्धयन है I पुस्तक के बाकी अंश भी आने वाली लेख श्रंखला में प्रकाशित किये जाएंगे]

JKN Twitter