कुशक बकुला जम्मू कश्मीर विधान सभा में

22 Feb 2018 13:31:41


 

उधर राज्य में स्थिति पल-पल बदल रही थी। पाकिस्तान ने अभी जम्मू कश्मीर का पूरा हिस्सा खाली नहीं किया था। नेहरु भी उसे खाली करवाने का रास्ता त्याग कर सुरक्षा परिषद की  भूल-भुलैयों में फँस चुके थे। इसी हालत में जम्मू कश्मीर विधान सभा के लिए  चुनावों की घोषणा हो गई। लद्दाख के लोगों ने संविधान सभा में जाने के लिए  आग्रह किया। कुशक बकुला जैसे लोग सभा में रह कर राष्ट्रीय हितों के पहरेदार बन सकते थे।  1951  में जम्मू कश्मीर संविधान सभा के लिए हुए चुनावों में वे लेह से निर्विरोध चुने गए। संविधान सभा के चुनावों तक तो  शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भारत की कसमें खाते थे लेकिन संविधान सभा में  नेशनल कान्फ्रेंस के सदस्य भर देने के बाद उनका रवैया बदला। वे जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता के नाम पर व्यवहारिक रूप में स्वतंत्र राज्य का सपना  देखने लगे। संविधान सभा में अन्य किसी भी दल का कोई सदस्य नहीं था।  प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े राजनैतिक दल प्रजा परिषद के अधिकांश  प्रत्याशियों के नामांकन पत्र ही रद्द कर दिए जाने के कारण उसने चुनावों का बहिष्कार कर दिया था। ऐसे अवसर पर कुशक बकुला ने व्यापक राष्ट्रहित में  मोर्चा संभाला। वैसे भी लद्दाख अब तक राज्य का उपेक्षित हिस्सा रहा था, नई  व्यवस्था में भी कहीं पुरानी मानसिकता से काम न होता रहे, इसको लेकर कुशक  बकुला चौकन्ने थे। लद्दाख बौद्ध परिषद पहले ही नेहरु को ज्ञापन दे चुकी  थी कि या तो यह संभाग सीधे महाराजा हरि सिंह के प्रशासन का हिस्सा रहे या  फिर लद्दाख को जम्मू या पूर्वी पंजाब से मिला दिया जाए।  नवनिर्वाचित  संविधान सभा का पहला सत्र 31 अक्तूबर 1951  को शुरु हुआ। दूसरे दिन प्रथम  नवम्बर को बोलते हुए कुशक बकुला ने आशा व्यक्त की कि यह सदन उन समस्याओं का समाधान खोजेगा जिनको आज तक हल नहीं किया जा सका। लद्दाख का अब तक उपेक्षित रहा क्षेत्र भी विकास के मार्ग पर चलेगा। लेकिन साथ ही उन्होंने  स्पष्ट संकेत भी दिया कि लद्दाख की समस्याएँ जम्मू एवं कश्मीर संभाग से अलग हैं। लद्दाख की भाषा और संस्कृति अन्य संभागों से हट कर है। इसलिए मुझे  आशा है कि यह सभा ऐसा संविधान तैयार करेगी जो लद्दाखियों को अपना आंतरिक  प्रशासन स्वयं चलाने का अधिकार प्रदान करेगा। कुशक बकुला का यह स्पष्ट संकेत था कि यदि कश्मीर के कुछ लोगों ने स्वायत्तता की बातें करनी शुरु कर  दी हैं तो यह अधिकार लद्दाखियों को भी मिलना चाहिए।

 

बकुला अपनी मातृभाषा  भोटी में बोले। जम्मू कश्मीर की विधान सभा (पूर्व में इसका नाम प्रजा सभा था) में भोटी में बोलने की शुरुआत कुशक बकुला ने ही की। उन्होंने स्पष्ट किया कि लद्दाख और करगिल के लोग भारत के साथ सुखद और मजबूत संबंध बनाना चाहते हैं। जम्मू कश्मीर संविधान सभा के सदस्य के रूप में लद्दाख के लोगों के अधिकारों, उसके विकास और भारत के साथ समरसता पर उन्होंने सबका ध्यान आकर्षित किया।

 

राज्य विधान सभा में बजट प्रस्तावों पर बोलते हुए  उन्होंने जो मुद्दे उठाए,  उसकी प्रदेश में लम्बे अरसे तक चर्चा होती रही।  वे सही अर्थों में जननायक सिद्ध हुए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रदेश सरकार लद्दाख के साथ हर क्षेत्र में सौतेला व्यवहार कर रही है। बजट में  लद्दाख का हिस्सा उसकी जनसंख्या को आधार बना कर नहीं बल्कि उसका भूगोल देख कर निर्धारित किया जाना चाहिए। उन्होंने लद्दाख के प्रति कोष आवंटन में सरकार के द्वारा किये जा रहे भेद-भाव को उजागर किया। परिणामतः सरकार को लद्दाख मामलों के लिये अलग से एक मंत्रालय का गठन करना पड़ा। सरकार ने उनके द्वारा बजट भाषण के दौरान उठाये गये सभी मुद्दों को स्वीकार किया और उनके समाधान का वचन दिया।

 

प्रश्न केवल लद्दाख का ही नहीं था । शेख़ अब्दुल्ला धीरे-धीरे अपने असली रंग में आ रहे थे। वे जम्मू कश्मीर की तुलना पाकिस्तान के समकक्ष  एक देश के रूप में ही करने लगे थे। मंत्रिमंडल ने शेख़ अब्दुल्ला में अविश्वास ज़ाहिर किया। अन्ततः शेख़ अब्दुल्ला को 8 अगस्त 1953 को पद से हटा दिया गया और उन्हें बन्दी बना लिया गया। शेख जम्मू कश्मीर की स्वतंत्रता के स्वप्न ही नहीं देख रहे थे बल्कि उसको प्राप्त करने के लिए विदेशी ताक़तों  के साथ सांठ-गांठ भी कर रहे थे।  उनके बाद बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद राज्य के प्रधानमंत्री बने। पाँच अक्तूबर 1953 को संविधान सभा में बख़्शी  मंत्रिमंडल के प्रति विश्वासमत के प्रस्ताव पर बोलते हुए कुशक बकुला ने कहा, "लद्दाख अत्यन्त पिछड़ा हुआ इलाका है। हमने पिछली सरकार के सामने  कितनी ही माँगें रखीं लेकिन कोई एक भी पूरी नहीं की गई। कबायली हमले के दौरान लद्दाख की जंस्कार घाटी में अनेक गोम्पा नष्ट कर दिए गये। अनेकों को लूट लिया गया। लोगों के पशु तक पाकिस्तानियों ने लूट लिए। हमने शेख अब्दुल्ला की सरकार से अनेक बार कहा कि जिनकी सम्पत्ति लूट ली गई है, सरकार को उनकी सहायता करनी चाहिए। नष्ट किए गए गोम्पाओं की पुनः मरम्मत करवाई जाए। लद्दाख में राजस्व फसल के रूप में नहीं बल्कि नकद वसूला जाए।  लद्दाख के स्कूलों में अध्ययन का माध्यम भोटी भाषा होना चाहिए। लद्दाख में उचित क्षेत्र में नहरों की खुदाई करवाई जाए और यातायात के लिए कम से कम  जीप चलने लायक एक सड़क बनाई जानी चाहिए। जैसा नया काश्मीर में कहा गया है, वैसा आत्मनिर्णय का अधिकार लद्दाख के लोगों को भी मिलना चाहिए। हमने अपनी इन माँगों के लिए धरना-प्रदर्शन भी किए लेकिन पाँच साल बीत जाने पर भी  हमारी बात सुनी नहीं गई। बख़्शी साहिब लोकप्रिय हैं । सबसे बड़ी बात यह  है कि वे जम्मू कश्मीर के भारत में विलय  के पक्ष में हैं।"कुशक बकुला के यह उद्गार एक प्रकार से शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ लद्दाखियों का श्वेत पत्र कहा जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि लद्दाख उसी के साथ है जो भारत के साथ है ।

 

कुशक बकुला को बख्शी मंत्रिमंडल में उपमंत्री के तौर पर शामिल किया गया। लद्दाख को पहली बार शासन में प्रत्यक्ष भागीदारी मिली। लेकिन अब सबसे बड़ा दायित्व प्रदेश में राष्ट्रवादी शक्तियों के हाथ  मज़बूत करना था। शेख अब्दुल्ला ने अपनी लड़ाई कश्मीरियों के स्वाभिमान को  लेकर शुरु की थी और उस समय बकरा पार्टी ने इसका जबरदस्त विरोध किया था  क्योंकि बकरा पार्टी कश्मीरियों, डोगरों,  बल्तियों,  दर्दों और  लद्दाखियों को दबा कर रखना चाहती थी। बकरा पार्टी के लोग अभी भी मुगलों,  तुर्कों,  अरबों और इरानियों के युग में घूम रहे थे। लेकिन अपने तानाशाही  रवैये के चलते शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर घाटी को मातृभूमि से अलग करके  स्वतंत्र देश के सपने देखने लगे और कश्मीरियों से विश्वासघात कर बकरों के  साथ ही मिल गए। ऐसे समय में लद्दाख के प्रतिनिधि होने के नाते कुशक बकुला पर इस षड्यंत्र से लड़ने का दायित्व आया था। पाँच फरवरी 1954 को उन्होंने  राज्य की विधान सभा में बोलते हुए स्पष्ट किया, " हम लद्दाख के लोग शुरु से  ही बार-बार कह रहे हैं कि हम भारत का अंग हैं । हम भारत की प्रशासनिक  व्यवस्था का हिस्सा बने हैं। लेकिन कोई यह न समझे कि हमने ऐसा भावनाओं में बह कर किया है। ऐसा नहीं है। हमारा विश्वास है कि जाति,  सम्प्रदाय और नस्ल में बिना भेदभाव किए सामाजिक,  आर्थिक और राजनैतिक सभी क्षेत्रों में सभी को समान अवसरों के लिए भारतीय संविधान अत्युत्तम है। हमारी इच्छा पंथ निरपेक्ष विधान की है,  वह भारत संविधान में ही पूरी हो सकती है। भारत का संविधान मानवता की समानता पर आधारित है। भारत का संविधान जम्मू कश्मीर के  सभी प्रकार के विकास का पूर्ण अवसर प्रदान करता है। यह केवल लद्दाख के लोगों का ही मत नहीं है बल्कि करगिल के लोगों का भी यही मत है। यह मत भी व्यक्त किया गया है कि जम्मू कश्मीर को अपनी इच्छानुसार भारत से अलग होने का भी अधिकार मिलना चाहिए। मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। यह विचार न तो जम्मू कश्मीर के लिए लाभदायक है और न ही भारत के हित में होगा। अभी भी प्रदेश में अनिश्चितता और असुरक्षा का वातावरण बना रहता है। हमारी हार्दिक इच्छा तो देश में सम्बंधों को और भी मज़बूत करने की है लेकिन अलग होने की बातें करने से यह संशय और भी गहराता जाएगा। इससे हमारी प्रगति में बाधा पड़ेगी। इससे उन लोगों को भी लाभ होगा जो अभी भी राज्य में और राज्य के बाहर भी गड़बड़ करने में आमादा है। वे अनिश्चय के इस वातावरण में प्रदेश  में शान्ति भंग करने में मशगूल हो जाएँगे। भारत से रिश्ता हमारी इच्छा ही  नहीं बल्कि हमारा पावन कर्तव्य भी है। अलगाव की बातों से विकल्प पाकिस्तान  ही बचेगा। उसके पीछे चलना अन्धकार की यात्रा ही कही जाएगी। ऐसी स्थिति में जम्मू कश्मीर के तीनों अंगों का एक साथ रहना भी मुश्किल हो जाएगा। एक और विकल्प आजादी का भी कहा जा रहा है। लेकिन वह विकल्प अव्यवहारिक है।  शत्रु देश आक्रमण करेगा तो हमारा क्या हश्र होगा ?  हमारा सभी प्रकार का विकास भारत पर ही निर्भर है। भारत का संविधान हमारी रक्षा करता है। उसमें  व्यक्ति- व्यक्ति में भेद नहीं होता। हमारा संविधान हमें आंतरिक स्वतंत्रता देता है। शेष कमी भारत पूरी करता है। भारत ऐसा करता रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। इसलिए मैं भारत से अलग होने के विचार से सहमत नहीं हूँ।"  

 

25 अक्तूबर 1956  को एक बार फिर कुशक बकुला ने स्पष्ट किया कि  जम्मू कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है। जम्मू कश्मीर में संविधान अधिनियम  1957 लागू होने के अवसर पर उन्होंने कहा, "यह अधिनियम पंथनिरपेक्षता पर आधारित है। इस अधिनियम में यह अंतिम रूप से और बिना किसी उपबन्ध के घोषणा  कर दी गई है कि यह प्रदेश भारत का अविभाज्य अंग है। अब यह अविभाज्यता प्राकृतिक नियम के अनुसार अपरिवर्तनशील हो गई है।  यही इस अधिनियम की आत्मा है। इससे अलगाव की बातें करने वालों की जुबान बन्द हो जाएगी। अब जम्मू कश्मीर उस महान भारत,  जो उच्च मानवीय आदर्शों से प्रेरित है,  जिसकी महान शानदार परम्पराएँ हैं,  विश्व जिसकी ओर मार्गदर्शन के लिए देखता है, जो विश्व में शान्ति का प्रेरक है,  का अटूट अंग है। इससे हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं है। सारा लद्दाख इस अवसर पर अभिभूत है।"   कुशक बकुला के इन उद्गारों से स्पष्ट है कि वे पहले दिन से ही इस काम में लगे  हुए थे कि भारत की संघीय सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बना जाए ताकि  लोकतांत्रिक प्रणाली के लाभ आम लोगों तक पहुँचें।


26 जनवरी 1957 को जम्मू कश्मीर में नया जम्मू कश्मीर संविधान अधिनियम लागू कर दिया गया। उसके बाद प्रदेश में विधान सभा के लिए 1957 में चुनाव सम्पन्न हुए। कुशक बकुला एक बार फिर लेह से निर्विरोध चुन लिए गए। लद्दाख में कुशक बकुला की लोकप्रियता का अन्दाज़ा  इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1962 में हुए विधान सभा के चुनावों में लेह  विधान सभा सीट पर उनके मुक़ाबले एक निर्दलीय प्रत्याशी छेरिंग फुंछोक खड़ा  हो गया। चुनाव में कुल मिला कर 20653 वैध मत पड़े। इनमें से 20095  मत  कुशक बकुला को मिले। यह किसी प्रत्याशी को अब तक मिले मतों का रिकार्ड था।

 

[यह उद्धरण कुशोग बकुला पर लिखी पुस्तक "आधुनिक लद्दाख के निर्माता - उन्नीसवें कुशोग बकुला लोबजंग थुबतां छोगनोर" में से लिया गया है, पुस्तक के लेखक हैं डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, जिनका जम्मू कश्मीर विषय पर गहन अद्धयन है I पुस्तक के बाकी अंश भी आने वाली लेख श्रंखला में प्रकाशित किये जाएंगे]

 

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