सेना की कार्रवाई से डरा पाक

22 Feb 2018 15:54:54


आशुतोष मिश्रा

पिछले दिनों भारतीय सेना की सतर्कता से पाकिस्तान आतंकियों की घुसपैठ कराने में असफल रहा है। जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत से लगने वाली सीमा रेखा पर स्नाइपर शूटर तैनात कर दिए हैं। पाकिस्तानी सेना इन शूटरों को सैलरी के साथ भारतीय सेना के जवानों को गोली मारने के लिए ईनाम भी देती है। इन शूटरों को भारतीय सैनिक को गोली मारने पर ईनाम के तौर पर 50 हजार रुपए से लेकर एक लाख रुपए तक दिया जाता है। यह राशि भारतीय सेना के जवानों की रैंक के हिसाब से तय होती है। अगर कोई शूटर भारतीय सेना के किसी अफसर को निशाना बनाता है तो उसे अधिकतम ईनाम दिया जाता है।

पाकिस्तानी और भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स कि माने तो पाकिस्तान ने उत्तरी कश्मीर के केरन सेक्टर से जम्मू में पलांवाला तक नियंत्रण रेखा पर 150 से ज्यादा स्नाइपर शूटर तैनात कर दिए हैं। इन शूटरों ने पिछले साल भारतीय सेना के जवानो को निशाना बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाया है। पाक ने अपने इन स्नाइपर्स की इस टीम का नाम बॉर्डर एक्शन टीम 'बैट' रखा है।

सूत्रों की माने तो पाकिस्तानी सेना ने अल-बदर, जैश और लश्कर से जुड़े आतंकियों में से ही कुछ को अलग कर लेता है और उन्हें अलग से निशानेबाजी की ट्रेनिंग दी जाती है। निशाना लगाने में पक्का हो जाने पर इन आतंकियों को स्नाइपर शूटर के तौर पर भारत से सटे सीमा पर तैनात कर दिया जाता है। सूत्रों का कहना है कि हिज्बुल, जमायतुल मुजाहिद्दीन, हरकत और तहरीक उल मुजाहिद्दीन के भी लगभग 24 आतंकियों को स्नाइपर शूटर की ट्रेनिंग दी गई है। पिछले एक साल के दौरान करीब 32 सैन्यकर्मी पाकिस्तानी गोलीबारी में शहीद हुए हैं। इनमें लगभग डेढ़ दर्जन भारतीय जवानों को पाकिस्तानी चौकियों में बैठे स्नाइपर शूटरों ने ही निशाना बनाया है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान ने इन स्नाइपर शूटरों को अत्याधुनिक राइफल दिए हैं, जिसमें अधिकतर अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया के बने होते हैं। इन्हें दिये जाने वाले राइफल में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि उसकी रेंज दूर तक हो। इंग्लैंड में निर्मित 50/12।7 एमएम कैलिबर की स्नाइपर राइफल की मारक क्षमता लगभग दो किलोमीटर है और यह काफी हल्की है। इसकी लंबाई करीब 60 इंच है। जब इसके बट फोल्ड किया जाता है तो यह 48 इंच में सिमट जाती है।

भारतीय सेना के पास भी स्नाइपर शूटर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से लेकर नियंत्रण रेखा पर महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात हैं। यह रूस में 1960 में बनी द्रगनोव राइफल ही मुख्य तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यह अपेक्षाकृत काफी भारी और 800 मीटर तक ही सटीक मार करने में समर्थ है। वर्ष 2012 में भारतीय सेना ने इस राइफल के विकल्प तलाशना शुरू किए थे और अभी तक यह प्रक्रिया जारी है।

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