भारतीय संस्कृति का विराट् बोध कराता ललितादित्य की राजधानी परिहासपुर

24 Feb 2018 15:00:58

 

डा. मयंक शेखर

कालावधि में कुछ समय ऐसे होते हैं जिनका आकलन करना अत्यन्त कठिन होता है । इतिहास में ऐसा ही एक समय ललितादित्य का शासन काल (725-761 ई.) है । ललितादित्य के विषय में आधुनिक भारत के तथाकथित इतिहासकारों ने कुछ भी लिखना उचित नहीं समझा । यह उनकी एकपक्षीय दृष्टिकोण को दिखाता है । कश्मीर में गोनन्द वंश के अन्तिम शासक बालादित्य की मृत्यु के पश्चात कार्कोट वंश का उदय हुआ है । कार्कोट वंश का प्रथम राजा दुर्लभवर्धन था । उसकी पत्नी का नाम अनंगलेखा था । दुर्लभवर्धन के बाद उसका पुत्र दुर्लभक राजा बना । वह इन्द्र के समान इस पृथ्वी पर शासन करता था । दुर्लभक का दूसरा नाम दुर्लभक प्रतापादित्य भी था । उसकी पत्नी का नाम नरेन्द्रप्रभा था । कालान्तर में नरेन्द्रप्रभा के तीन पुत्र हुए जिनका नाम क्रमशः चन्द्रापीड, तारापीड, एवं मुक्तापीड था । मुक्तापीड का ही दूसरा नाम ललितादित्य था । इसी कारण उसे ललितादित्य मुक्तापीड भी कहते हैं । चन्द्रापीड एवं तारापीड के बाद ललितादित्य राजा बनता है । एशिया महाद्वीप की राजनैतिक व सांस्कृतिक इतिहास के निर्माण में ललितादित्य के शासनकाल का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है । ललितादित्य के विषय में विस्तृत जानकारी का एकमात्र स्रोत कल्हण विरचित “राजतरंगिणी” है जो उसके शासनकाल, उसकी दिग्विजयी-अभियान, एवं उसके द्वारा निर्मित सांस्कृतिक व धार्मिक स्थलों की जानकारी देता है। इसके अतिरिक्त फारसी विद्वान् व लेखक अलबरुनी द्वारा लिखित “तारीख-अल-हिन्द” (जिसमें वह मध्यकालीन भारतीय जीवन-शैली के सभी पक्षों- धार्मिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक, विज्ञान, गणित- का विस्तृत वर्णन करता है) में ललितादित्य के विजय-अभियान का उल्लेख मिलता है ।

श्रीनगर से लगभग १४ मील दूर वराहमूल (बारामूला) के रास्ते पर परिहासपुर नगर स्थित है । परिहासपुर नगर की स्थापना काश्मीर नरेश ललितादित्य ने की थी ।

ततः परं परिहासशीलो भूलोकवासवः ।

 विहसद्वासवावासं परीहासपुरं व्यधात् ॥ 

राजतरंगिणी 4.194

परिहासपुर नगर ललितादित्य के राज्य की राजधानी थी । ललितादित्य एवं उसके सभासदों ने इस नगर में कई उत्कृष्ट मन्दिर, चैत्य, विहारों आदि का निर्माण किया था । परिहासपुर में ललितादित्य ने पाँच भव्य भवनों का निर्माण किया जो चतुःशाल भवन थे । चार भवन भगवान् विष्णु के चार विविध रूपों ─ श्रीपरिहासकेशव, श्रीमुक्तकेशव, महावराह एवं गोवर्धनधर ─ को समर्पित थे ।

 


[चित्र: मुख्य भवन, परिहासपुर नगर के अवशेष]

 


 

राजतरंगिणी के अनुसार, सहस्र पल चाँदी से निर्मित श्रीपरिहासकेशव की प्रतिमा ऐसी प्रतीत होती थी जैसे समुद्र में शयन कर रहे भगवान् विष्णु ज्योतिकिरणों से युक्त होकर परिहास कर रहे हो ।

तावन्त्येव सहस्राणि पलानां रजतस्य ।

             संधाय शुद्धधीश्चक्रे श्रीपरिहासकेशवम् ।। 4.202

विरेजे राजतो देवः श्रीपरिहासकेशवः।

                लिप्तो रत्नाकरस्वापे मुक्ताज्योतिर्भरैरिव ॥  4.195

                                                                      

84 तोला स्वर्ण से बनी श्रीमुक्तकेशव की प्रतिमा ऐसी प्रतीत होती थी जैसे मानो भगवान् विष्णु के नाभि से निकलने वाले कमल की कान्ति उसमें समाविष्ट हो गई हो ।

नाभिनलिनकिञ्जल्कपुञ्जेनेवानुरञ्जितः ।

             अचकात्काञ्चनमयः श्रीमुक्तकेशवो हरिः ॥ 4.196

     तोलकानां सहस्राणि चतुर्भिरधिकानि सः ।

            अशीतिं निदधे हेम्नो मुक्ताकेशवविग्रहे ॥ 4.201

 

जब दैत्यों ने पृथ्वी को पाताल में लेकर चले गये तब समस्त पृथ्वी अंधकारमय हो गई थी। उस समय भगवान् विष्णु ने महावराह के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर अपने स्थान पर व्यवस्थित किया । ललितादित्य के द्वारा निर्मित महावराह की प्रतिमा, सूर्य की प्रखर किरणों की भाँति चमकती थी ।

 

महावराहः शुशुभे काञ्चनं कवचं दधत् ।

            पाताले तिमिरं हन्तुं वहन्निव रविप्रभाः ॥ 4.197

 

ललितादित्य ने भगवान् विष्णु का गोवर्धनधर के रूप में मन्दिर बनवाया था । चाँदी से बनी गोवर्धनधर विष्णु की प्रतिमा ऐसी प्रतीत होती थी मानों वह गायों के श्वेत दुग्धधार से बनी हो।

गोवर्धनधरो देवो राजस्तेन कारितः ।

 यो गोकुलपयःपूरैरिव पाण्डुरतां दधे ॥ 4.198

 

 



[चित्र: भगवान् गोवर्धन]

ललितादित्य ने इन चार भवनों में मुख्य देवता की प्रतिमा के अतिरिक्त पार्श्व देवताओं की प्रतिमा का भी निर्माण करवाया ।

परिहासपुर में ही ललितादित्य ने एक विशाल शिला-स्तम्भ (54 हाथ ऊँचा) का निर्माण करवाया जिसकी चोटी पर ध्वजा के रूप में गरुड (दैत्यों के शत्रु) की प्रतिमा स्थापित की । भगवान् विष्णु के वाहन के रूप में गरुड प्रसिद्ध हैं ।

चतुष्पञ्चाशतं हस्तान्रोपयित्वा महाशिलाम् ।

ध्वाजाग्रे दितिजारातेस्तार्क्ष्यस्तेन निवेशितः ॥  4.199

 

पाँचवे भवन का नाम “राजविहार” था जिसके अन्दर एक बृहत् चैत्य, व ताम्बे से निर्मित एक बृहत् बुद्ध की प्रतिमा थी।

चक्रे बृहच्चतुःशालाबृहच्चैत्यबृहज्जिनैः ।

 राजा राजविहारं स विरजाः सततोर्जितम् ॥  4.200

 

परिहासपुर में ललितादित्य के अमात्यों, सेवकों ने भी शताधिक अद्भुत भवनों का निर्माण किया । कल्हण के अनुसार, ललितादित्य का शासनकाल 36 वर्ष, 7 माह व 11 दिन था । 36 वर्षों तक शासन करने के पश्चात ललितादित्य गोलोक को प्रस्थान करते हैं । ललितादित्य की मृत्यु के विषय में भी अनेक किवंदन्तियाँ हैं ।                             

भारतवर्ष के इतिहास में कुछ वर्ष ऐसे होते हैं जब महान् विभूतियों का आविर्भाव होता है। ऐसा ही एक क्षण था जब भारतवर्ष में ललितादित्य नाम के राजा का आविर्भाव हुआ था । ललितादित्य का संस्मरण करना हमारा पुण्यतम कर्त्तव्य है । भारतवर्ष किस ऊँचाई तक पहुँच सकता है- इसका एक अवलोकन ललितादित्य के शासनकाल का सम्यक् मूल्यांकन करके किया जा सकता है । ललितादित्य ने भारतवर्ष की महिमा को अपने पूर्ण स्वरूप में प्रत्यक्ष किया था । ललितादित्य जैसा व्यक्ति, वैसी दृष्टि, परिस्थितियों के साथ समन्वय, उसकी देशिक व वैदेशिक नीतियाँ, कलागुणग्राहिता- इन सभी का एक जगह समन्वय होना अति दुष्कर है ।

हमारा यह सौभाग्य है कि हमारे पास ललितादित्य जैसे राजा की थाती है किन्तु आज उनकी सिर्फ स्मृति मात्र शेष है और यह स्मृति गौरव की स्मृति है, श्रद्धा की स्मृति है । 

कश्मीर का परिचय जहाँ समस्त विश्व में “शारदा देश” के रूप में, ज्ञानाधिष्ठात्री देवी के रूप में होता है, वहीं हमारे मानसपटल पर ललितादित्य जैसे दूरदर्शी राजा का नाम अनायास ही आ जाता है। ललितादित्य ने कश्मीर व भारतवर्ष के परिचय में अपना अमूल्य योगदान दिया और आज ललितादित्य के कारण वैश्विक राजनीतिक मानचित्र पर कश्मीर विश्व भर में प्रसिद्ध है, सुप्रतिष्ठित है । ललितादित्य ने अपना समग्र जीवन भारतवर्ष की अखण्डता को स्थापित करने में अर्पण कर दिया ।  

 

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