अनुच्छेद 35(ए) की वैधता को चुनौती 

15 May 2018 12:33:59

 


उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 35(ए) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई छह अगस्त तक के लिए कर दी है। 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया था। इस आदश के जरिए भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35ए जोड़ दिया गया है।

केन्द्र सरकार ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ के समक्ष दलील दी कि यह मसला बहुत ही गम्भीर है और न्यायालय को तत्काल कोई अंतरिम आदेश नहीं सुनाना चाहिए। प्रमुख याचिकाकर्ता दिल्ली के गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘वी द सिटीजन्स’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 370 को स्थायी दर्जा दिया है। विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के परिप्रेक्ष्य में इस मसले की व्याख्या जरूरी है, इसलिए पीठ को फिलहाल कोई अंतरिम आदेश नहीं सुनाना चाहिए। इसके बाद न्यायालय ने मामले की सुनवाई छह अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी। इस मामले में तीन अन्य याचिकाएं भी दायर की गयी हैं। न्यायालय ने सभी को एक साथ संलग्न कर दिया था।

इस अनुच्छेद को हटाने के लिए एक दलील ये दी जा रही है कि इसे संसद के जरिए लागू नहीं करवाया गया था. दूसरी दलील ये है कि देश के विभाजन के वक्त बड़ी तादाद में पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आए। इनमें लाखों की तादाद में शरणार्थी जम्मू-कश्मीर राज्य में भी रह रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार ने अनुच्छेद 35A के जरिए इन सभी भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी प्रमाणपत्र से वंचित कर दिया है। इन वंचितों में 80 फीसद लोग पिछड़े और दलित हिंदू समुदाय से हैं। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर में विवाह कर बसने वाली महिलाओं और अन्य भारतीय नागरिकों के साथ भी जम्मू-कश्मीर सरकार अनुच्छेद 35A की आड़ लेकर भेदभाव करती है।

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